बाइक : एक आत्मकथा
नब्बे का दशक था। शहर से दूर एक बड़ी सी फैक्ट्री में मेरा जन्म हो रहा था। यह मानव जन्म की प्रक्रिया से थोड़ा अलग है। मेरे हड्डियों के ढाँचे यानी चेसिस पर धीरे धीरे अब विभिन्न अंग लगाए जा रहे हैं। एक फरिश्ता मेरे पहिये लगा रहा, दूसरा मेरी हेड लाइट, कोई मीटर लगा रहा तो कोई मेरी पीठ यानी सीट लगा रहा। और भी अनगिनत अंग लगाए जा रहे। आखिर में मेरा हृदय यानी इंजन लगाया गया। एक सीनियर फरिश्ते ने मेरी फाइनल टेस्टिंग की और मुझे डीलर भेजे जाने के लिए रवाना कर दिया।
मैं सोच रही थी आखिर मेरा मालिक कैसा होगा? सुना है कुछ लोग अपनी बाइक का काफी ध्यान रखते। कुछ उसे अपने परिवार का हिस्सा बना लेते। बिल्कुल अपने बच्चे जैसा पालते। पर सुना ये भी है कुछ लोग बेरहम होते। काफी खराब तरीके से बाइक चलाते। दूसरों को दिखाने के लिए तेज तेज रेस देते और झट से ब्रेक लगा देते। एक दो साल में ही उसे मरीज़ बना देते। सोच के डर लग जाता। पर देखो अब नियति में क्या लिखा है। मेरी सारी सखियां अलग अलग सपने सजा बैठी हैं। हर दिन एक ना एक सखी की विदाई हो जाती है।
मेरी भी विदाई का दिन आ ही गया। उस परिवार में मुझे चलाने वाले दो लड़के थे। बड़ा लड़का मेरा काफी ध्यान रखता था। हर महीने मेरी सर्विस खुद ही कर देता था। चलाता भी काफी अच्छे से था। छोटा वाले में थोड़ा लड़कपन था। मौज मस्ती में रहता था। कई बार तो मुझे अपने दोस्तों को भी चलाने दे देता था। मुझे उसके दोस्त कभी समझ नहीं आए वैसे। खैर थोड़े दिन में बड़े लड़के की शादी हो गई और उसका तबादला किसी दूसरे शहर में हो गया। मुझे काफी खुशी हुई कि अब मैं सही व्यक्ति के हाथों चलूँगी।
ये छोटा सा परिवार काफी अच्छा था। इनका एक छोटा सा प्यारा लड़का भी था। वह खुशी खुशी आगे टंकी पर बैठ कर जाता था। कई बार टंकी पे ही सो भी गया। मुझे डर लगता था कि कहीं गिर ना जाए। मैं कैसे ही उसे बचा पाऊँगी। एक बार तो मेरी टंकी पर बैठे बैठे उसने आलू का पैकेट बीच रास्ते गिरा दिया। ना जाने कितने आलू इधर उधर बिखर गए। एक बिचारा गाड़ी के नीचे दब गया। उस वक्त़ मुझे बहुत ज्यादा हसी आ रही थी। बच्चे भी काफी जिद्दी होते। उनकी जिद्द ना मानो तो पूरी दुनिया सर उठा लेंगे।
देखते ही देखते बच्चा बड़ा हो गया। बाजार में अब काफी नयी आधुनिक बाइक आ गयीं। वो तेल भी कम खाती हैं। पावरफुल इंजन लगा है। मालिक ने अब एक दूसरी बाइक ले ली। अतः अब मैं ख़ड़ी रहती हूँ। धूल ज़मने लगी है। एक दिन तो मालिक को कहते सुना कि वो मुझे अब किसी और को बेच रहे। उस रात तो मैं सो भी नहीं पायी। सोचा मुझसे मेरे फर्ज निभाने मैं कहाँ गलती हो गयी? मैंने तो कभी अधिक कुछ नहीं माँगा। ना महँगा सीट कवर। ना चमकती हुई पोलिश। ना ही मैं रास्ते चलते चलते बंद पड़ी। ना ही कभी मैंने अपने इलाज में ज्यादा पैसे खर्च करवाये। आखिर क्यूँ मुझे पराया कर रहे। सिर्फ इसलिए कि मैं अब पुरानी हो गयी? या फिर मैं ज्यादा तेल खाती? या फिर मैं ज्यादा आवाज करती? आज कल की गाड़ी देखो कितनी शांत होती हैं। आवाज ही नहीं करती। अरे अब शेर गरजेगा तो उसकी आवाज़ तो गूंजेगी ही। पता नहीं नया मालिक कैसा होगा। क्या वो मेरी इतनी देख रेख करेगा? वो रात बहुत कष्टकारी थी।
अगले दिन पता चलता है कि बेचने का विचार छोड़ दिया गया। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं। भले ही अब मैं नहीं चलती पर इसका मतलब ये थोड़ी की किसी बुरे व्यक्ति के हाथों में चली जाऊँ। समय बीतता गया और एक दिन वो छोटा लड़का अपनी मम्मी के साथ मुझे चलाने आया। उसके पैर अभी नहीं आते। पर मुझे देख कर काफी खुश होता है । कभी कभी मुझे स्टार्ट करके देखता। चलाना अभी आता नहीं उसको, बस मुझे स्टार्ट करके ही खुश हो जाता। लड़का भी होशियार दिख रहा। मेरे एक दो खराब बल्ब उसने सही कर दिए। एक दो जगह पैंट भी कर दिया। कभी कभी मुझे धों के पोलिश भी कर देता। काफी ध्यान रखता है वो मेरा।
धीरे धीरे उसने अब मुझे चलाना सीख लिया। हाँ शुरू में एक दो बार मुझे गिराया भी। हाय बुढ़ापे में गिरने से काफी चोट लगती। लेग गार्ड जंक लगने की वजह से गिरते ही टूट गया। खैर कोई ना, अब मैं पुरानी जो हो गयी। पर इसके साथ घूमने में काफी मज़ा आता। ज्यादा दूर इसे जाने नहीं देते घरवाले, बस पास में ही हम दोनों घूमकर आ जाते। मेरे काफी पुर्जे नए लगा दिए इसने। रोज कुछ ना कुछ बदलता रहता। कभी कारबेटर साफ़ कर देता, कभी हेड लाइट का बल्ब बदल देता। अब तो इसने नयी बैटरी लगा दी। काफी दिन बाद मेरा हॉर्न बोला। कहाँ मैं खुद को बुढ़ा समझने लगी थी, कहाँ इसने फिर से मुझे नया सा कर दिया।
एक बार तो इसने मेरा इंजन ही खोल डाला। उस दिन तो लगा मैं वापस स्टार्ट नहीं हो पाऊँगी। पर ऑपरेशन सक्सेस रहा। मेरे हृदय का वाल्व यानी पिस्टन बदल दिया। मैं फिर से अब तेज भागने लगी। बीच बीच में मेरे कुछ पुर्जे बदलते रहे तो मैं एकदम नयी जैसी दिखती रहती।
अब मेरी जैसी बाइक बाजार में कम हो गयी हैं। आज कल की बाइक ज्यादा पॉवरफुल, ज्यादा माइलेज, ज्यादा सुन्दर दिखाई देती है। पर फिर भी कुछ लोग ऐसे हैं जो मेरे जैसी पुरानी गाड़ियों के दीवाने हैं। इसलिए काफी बार लोग मुझे रास्ते में मुड़ कर देखते हैं। कुछ लोग तो प्रशंसा भी करते की अभी तक इतनी मेनटैन कर रखी। मेरी कुछ सखी तो कब की परलोक सिधार गयी। कुछ तो खड़े खड़े गल गयीं। अगर सही तरह से रखा जाए तो कोई भी चीज़ सालों साल चलती है। सब मेरे मालिक की कृपा है। देखो, और कितने साल चलती रहती हूँ। मुझे खुशी है जो बच्चा कभी मेरी टंकी पर बैठ के जाता था, वो अब मुझे उन्हीं सड़कों पर खुशी से चलाये जा रहा है। शायद उसके लिए मैं कभी पुरानी हुई नहीं।
धन्यवाद,
Ayush P Gupta
26 Sept 2026