आखिर कहाँ हो तुम?
उस खिलती हुई कलि में हो?
या फिर मुरझाती हुई पत्ती में?
क्या उस पेड़ के ठोस तने में,
या फिर दबी हुई उन जड़ों में हो,
आखिर कहाँ हो तुम?
उगते हुए तेज सूरज में हो?
या रात चढते सफेद चाँद में?
या फिर उन टिम टिमें सितारों में,
या फिर उस नीले आकाश में हो,
आखिर कहाँ हो तुम?
क्या पहाड़ों की चोटी पर हो?
या उफनती हुई नदी में हो?
क्या उस रेत की उड़ती आँधी में हो,
या फिर गहरे समन्दर में समाये हो?
आखिर कहाँ हो तुम?
क्या माँ के आँचल में छुपे हो?
या पिता के भारी कंधों पर हो?
या किसी के अश्रुओं में घुले हो,
क्या अधूरे लेखन की पंक्तियों में हो?
आखिर कहाँ हो तुम?
शायद उस हारे व्यक्ति के साथ बैठे हो,
या उस बच्चे की हसीं किलकारी में हो,
या फिर उस बूढ़े की अंतिम दुआ में हो,
या उस मृतक की दहन ज्वाला में हो,
आखिर कहाँ हो तुम?
धन्यवाद,
Ayush P Gupta
13 Aug 2026