माँ, तुम मुझे कुछ क्यों नहीं कहती
मैंने काँच का ग्लास तोड़ा,
तुमने मुझे बहुत मारा,
घर आकर तुमसे झूठ बोला,
तुमने मुझे बहुत पीटा,
अब यूँ ही रिश्ते तोड़ देता हूँ,
तब भी तुम मुझे कुछ नहीं कहती,
माँ, तुम मुझे कुछ क्यों नहीं कहती।
तुमने पुछा होमवर्क किया?
मैंने झूठ मूठ का सर हिलाया,
तुमने पुछा खाना खाया?
मैंने भारी टिफिन हिलाकर दिखाया,
अब दिन का खाना शाम को खाता,
तुमने एक बार भी मुझे नहीं डाटा,
माँ, तुम मुझे कुछ क्यों नहीं कहती।
मुझे खेल के लौटने में देरी हुई,
तुमने मुझे जमकर डाट लगाई,
बाहर दोस्तों से लड़ाई हुई,
तुमने फिर मेरी पिटाई लगाई,
अब ना जाने कितनी ही देर से आता हूँ,
तुम बिना डांटें जल्दी से सो जाती,
माँ, तुम मुझे कुछ क्यों नहीं कहती।
अंधेरे में पढ़ने से बहुत डाटा,
हर बार लाइट जलाकर पढ़ने को कहा,
शाम को अंधेरा कमरा तुम्हें पसंद नहीं,
बार बार लाइट जलाने को कहा,
अब रात को भी अंधेरे में पड़ा रहता हूँ,
तुमने एक बार भी गुस्सा नहीं किया करती,
माँ, तुम मुझे कुछ क्यों नहीं कहती।
अब तो चप्पल भी सीधी पहनता,
फिर भी ठोकरें ज्यादा लगती जा रही,
अब तो दुध का ग्लास भी नहीं गिरता,
फिर भी जिंदगी ऐसी की गिरती जा रही,
शायद तुम्हें अब बड़ा लगने लगा हूँ,
पर तुम्हारे लिए तो हमेशा बच्चा ही हूँ,
माँ, तुम मुझे कुछ क्यों नहीं कहती।
धन्यवाद,
Ayush P Gupta
15 Aug 2026