दादा ले पोता बरते

आज सुबह मैंने अपनी माँ से एक तौलिया यानी हैन्ड टौवल माँगी। माँ ने मुझे एक पुरानी तौलिया दी। वैसे तो काफी सुन्दर तौलिया हैं हमारे पास, जिसे हम रोजाना काम में नहीं लेते, वो सिर्फ बाहर जाने या मेहमान आने पे दर्शन देती हैं। कम से कम पन्द्रह साल पुरानी होगी। वैसे तो ठीक ठीक है, पुरानी नहीं लगती पर बचपन से उसे देख देख कर मेरा खून खौल जाता है। पर मैं कुछ कह नहीं पाता।
मेरे घर में कई सामान ऐसे हैं जो करीब बीस साल पुराने होंगे, पर हमारी नजर में वो अभी भी नये ही हैं। कृपया इस हम में आप मुझे शामिल ना करें। मेरी रोज की इस पर बहस होती है। कुछ सामान तो ऐसे हैं जो कभी काम ही नहीं आए। पर हम सबको उम्मीद है कि ये चीज़ एक दिन काम आयेगी। वो काम कब आयेगा किसी को नहीं पता। अगर आप हटाने की कह दो, तो तर्क दिया जायेगा, कि इसमे क्या बिगड़ा है, नयी तो है, पैसा फालतू आ रहा है।
पहले समझ नहीं आता था कि हम सामान फेंकते क्यों नहीं, आखिर जब काम नहीं आ रहा तो हटा दो। अगर काम पड़ा भी तो आप दोबारा ले लेना। मैंने तो एक नियम भी बना दिया था, कि अगर कोई सामान पाँच साल से काम नहीं आया तो हटा दो। वो आगे भी काम नहीं आएगा। कितना भी आप समझा लो, पर इनकी हठ के आगे आप हार ही जाओगे। इस बुद्धी का रहस्य समझने के लिए हम आपको जनकपुरी यानी हमारे दादा जी के घर लिए चलते हैं।
उस घर का हाल बताने में झिझक हो रही है, पर मुझे पता है कि कहीं न कहीं सभी घर का यही हाल है। बस हमें अपने घर का हाल ज्यादा खराब लगता है। एक चीज पहले बता दूँ, हम गरीब नहीं थे, सुना है बहुत अमीर थे। बस सुना ही है मैंने, देखा तो कभी नहीं। घर में घुसते ही आपको ऐसा लगेगा जैसे संग्रहालय आगए हों। हर चीज़ पुरातत्व है। जैसे कि अभी जमीन खोदकर ख़जाना मिला हो। बस आप उसे ख़जाना कम, कबाड़ ज्यादा बोलेंगे। किसी के भावों को हानि न पहुंचे इसलिए हम ख़जाना ही बोलेंगे।
एक पुराना टीवी, जिसको न जाने कितनी बार दिल का दौरा पड़ चुका है। बस साँसें गिन रहा है। वजन भी बहुत है। पेट काफी ज्यादा बाहर है। आज कल के टीवी कितने पतले हैं, पर इस मोटे को पतला होना मंजूर नहीं। खैर उमर भी हो गयी। मगर मेरी दादी से पूछो, बिल्कुल नया है, इसमे क्या बिगड़ा। अभी तो और सुनिये। इस टीवी का एक बड़ा बुजुर्ग भी ऊपर स्लैब पर रखा है। वो तो सच में पुरातत्व है। शायद जब टीवी का अविष्कार हुआ होगा तब लिया होगा। चूहे उसकी पीछे से कमर खा चुके हैं। चलना तो दूर वो बस रखा हुआ है। क्यों? इसका राज भी हमारी दादी के साथ ही चला गया। अफसोस है वो इसे साथ नहीं ले जा पायीं। आश्चर्य ये है कि उनके बेटे भी इसको हटा नहीं पाए। शायद सौ दोसौ कम मिल रहे होंगे।
थोड़ा और अंदर चलेंगे तो आपको पुराने संदूक दिखेंगे। एक दम लोहा लाठ। खुद ही इतने भारी हैं कि सामान रखने के बाद तो क्या हो। काम के ही होंगे, ना जाने उनमे क्या भरा था। हाँ एक अलमारी पे एक तेल की शीशी है। पिताजी बताते हैं करीब चालीस साल पुरानी होगी। वो चालीस अब पचास हो गया होगा। उस तेल को चुल्लू का तेल बोलते हैं। दर्द में काफी आराम देता है। काफी कीमती है। इतना क़ीमती हो गया की बिना उसे लगाये दादा दादी चल दिये। अफसोस साथ नहीं ले जा पाये।
और ऊपर चलेंगे तो एक लोहे की बाल्टी पड़ी मिलेगी जिसमें सौ साल पहले चूना घोला गया होगा। बचपन से उसे वहाँ छत्त पे रखा देखा है। माँ ने बताया उनकी शादी से वो वही रखी है। कई साल बाद मैंने उसे उठाया तो बाल्टी तो उठ गयी पर उसके नीचे का हिस्सा, जिसमें चूना जमा हुआ था, वही जमीन पर रह गया। मैंने इतनी दरिद्रता नहीं देखी। पैसा होकर भी यहाँ उद्धार नहीं हो पाया। मैंने बाल्टी वापस वहीं रख दी, मुझे क्या। उस वक्त़ मुझे प्रेमचंद के उपन्यास की याद आने लगी।
ऐसी ना जाने कितनी नयी चीजें आज भी पड़ी हुई हैं। एक पीढ़ी तो चल बसी। दूसरी पीढ़ी को रोग दे गयी। अब वो सब चीजें उनके लिए क़ीमती हो गयीं। भाग्य से वो रोग मेरी पीढ़ी में नहीं आ पाया। सोचा एक दिन सब फेंक दूँगा, पर जब रोगियों को देखता हूँ तो दया आ जाती, सोचता मुझे क्या। कुछ सामान हमारे पिताजी उठा लाये। जैसे वो संदूक। देखो कितनी मजबूत लोहे की हैं। काम आयेगी। देखते ही देखते हमारा घर भी खजाने से भर गया।
पर उस ख़ज़ाने में और हमारे ख़ज़ाने में फर्क़ है। हमारा बस सामान पुराना है। कबाड़ नहीं। चीज सब चलती हुई हैं। खराब कुछ भी नहीं। बस हाँ काम में शायद कभी ना आयें। पहले हठ थी कि सब फेंक दो। पर अब हठ थोड़ा समझदार हो गयी है। उसे पैसे की समझ आ गयी है। सिर्फ चीज़ पुरानी है तो इसका मतलब बेकार नहीं। वो तो गवाही है इस बात की कि उसके उपभोगता कितने सम्भाल के सामान को रखते हैं। फेंकना असान है पर जोड़ना उतना ही मुश्किल। पर मन जो है मानता नहीं। जिंदगी तो एक ही मिली है, और वो सदा के लिए नहीं है।
हमारे घर में भी काफी सामान हो गया है। वो तो मेरी माँ काफी सामान हटा देती है। वरना तो घर में पैर रखना मुश्किल हो जाता। फिर भी अभी बहुत कुछ हटाना बाकी है। हमने तो अपना पुराना मोटा टीवी हटा दिया, पर आज भी वो पुरातत्व टीवी, उस घर में, उसी स्लैब पर रखा हुआ है। उसके मालिक तो इस जीवन लीला से मुक्त हो गए, पर उसे मुक्त करना भूल गये। उसे देखकर एक ही सीख मिलती है, इंसान पैसे से नहीं, सोच से गरीब होता है।
धन्यावाद,
Ayush P Gupta
12 Aug 2026