यूँ ही चल दिये

एक शाम मैं और गुड्डू ऑफिस करके रूम लौट रहे थे। यह बात तब कि है जब हम दोनों साथ ही गुडगाँव रहते थे। ऑफिस के अलावा कुछ काम होता नहीं था। शुक्रवार का दिन था। वीकेंड का कुछ सोचा नहीं था। तभी कुछ बात पे गुड्डू ने बोला कि उसने मसूरी नहीं देखा।
हाँ जी मसूरी जिसे पहाड़ों की रानी का दर्जा मिला है। मैं तो काफी बार मसूरी गया हूँ। देहरादून से बस तीस किलोमीटर की दूरी पर है। काफी कम दूरी पर होने पर भी मसूरी काफी ऊँचाई पर स्थित है। जो मसूरी घुमा है, उसे पता होगा क्यूँ मसूरी को रानी का दर्जा दिया है। जिसने नहीं देखा, उसको मसूरी दिखाने का पुण्य कर्म मैं किसी सौभाग्य से कम नहीं समझता।
मुझे घूमी हुई जगह बार बार जाना काफी पसंद है। हाँ ये बात थोड़ी अटपटी है। लोग कहते हैं नयी जगह जाओ, कुछ नया देखो, पर मेरा मन नयी जगह जाने से कतराता है। शायद मन डरता है। घूमी हुई जगह का मानचित्र मेरा मन पहले ही बना लेता है। तभी उसे डर नहीं लगता। उसे उस सफर का हर पहलु पहेले से पता होता है। बस फिर क्या था, मैंने गुड्डू को बोला चलो बैग पैक करो, मैं तुम्हें घुमा के लाता हूँ। ऐसे ही अचानक हमारा मसूरी का ट्रिप बना।
करीब आठ बजे होंगे जब जाने का निश्चित हुआ। अगले एक घंटे में हम गुडगाँव से निकले और कश्मीरी गेट जाने लगे। गुड्डू की एक बात काफी अच्छी है, उसे कहीं जाने को बोलो तो फट से तैय्यार हो जाता है। नाटक नहीं करता। वैसे तो आलसी है, पर घूमने मामले में झटपट तैय्यार। ना टिकट था, ना कुछ बुकिंग। पर हम दोनों को भरोसा था मिलके कुछ ना कुछ जुगाड़ कर ही लेंगे।
उत्तराखण्ड जाने की सारी बसें आपको कश्मीरी गेट से मिलती हैं। हम देहरादून जाने वाली बस में बैठ गए। थोड़ा अजीब तो था, पर हम दोनों को काफी मज़ा आ रहा था। सुबह होते ही हम देहरादून पहुंच गए। गुड्डू ने सोचा पहाड़ दिखेंगे। पर यहाँ से कोई पहाड़ नहीं दिखते। एक अच्छे रेस्टोरेंट देखकर हमने खाना खाया और फटाफट एक टेम्पो में बैठ गए। जाना कहाँ था? मसूरी अड्डे। या आप रेल्वे स्टेशन बोल दो। दोनों आमने सामने हैं।
मसूरी अड्डे से आपको मसूरी की बस मिलती है। हर आधे घंटे में एक बस। ये मुझे पहेले से पता था, पर शायद अब हालात थोड़े बदल गए हैं। हम जैसे ही मसूरी अड्डे पहुंचे, वहाँ एक लंबी लाइन लगी थी। हर सरकारी ऑफिस की तरह चार में से एक काउन्टर खुला था। और उसपर भी एक अधेड़ उम्र का आदमी बैठा होगा। जो आज भी कंप्यूटर चलाना सीख रहा है। पर अकड़ मसूरी से भी ऊँची। कुछ बोलके देखो, जिन्दा खा जायेगा, या ऐसे व्यंग करेगा कि आप का खून खोल उठेगा। खैर कुछ देर देखने के बाद समझ आ गया की यहाँ बिना प्राईवेट टैक्सी के मसूरी नहीं जा पायेंगे। तभी सामने प्राईवेट टैक्सी वाले हमे देखकर मुस्कुरा रहे थे।
हताश होकर हम बाहर निकले। थोड़ा दूर चले। मैं काफी निराश था, पर गुड्डू बोला कुछ ना कुछ जुगाड़ हो ही जाएगा। तभी एक बाइक रेंट वाले की दुकान दिखी। वहाँ हमें अपाचे बाइक रेंट पर मिल गयी। फिर क्या था, दोनों भाई बैठे और चल दिये। तब से मुझे विश्वास होगया की कितनी भी बड़ी समस्या आए, कुछ ना कुछ हल निकल ही जाता है, बस आप कदम तो आगे बढायें।
थोड़ा दूर चले ही थे, कि बारिश शुरू हो गई। हम एक ढाबे पर रुक गए। हाँ पहाड़ दिखने शुरू हो गए थे। वो ढाबा एक ढलान पर था। थोड़ी सी बारिश हुई और लग रहा जैसे नदी बहने लगी हो। बारिश कम नहीं हो रही थी। शाम से पहले मसूरी पहुंचना था। हम ऐसे ही निकल गये। बारिश में बाइक चलाने का अलग ही मज़ा है। टप टप बूंदे आपकी आँखों में लगातार गिरती हैं, जैसे आपको गिराकर ही मानेंगी।
मसूरी का रास्ता काफी मजेदार है। काफी ऊँची सड़के हैं, और हर थोड़ी ऊचाई के बाद नीचे घाटी के सुन्दर नजारे। भले ही आप कितनी बार आए हों, पर वो नजारे हर बार आपको मंत्र मुग्ध कर देंगे। बारिश के बाद धुंद जैसे पहाड़ों को ढक सी रही हो। बादल आपके सामने जन्म ले रहे होते हैं। छोटे बादल जैसे पहाड़ों पर खेल रहे हों। कभी इस पहाड़ की चोटी कभी उस पहाड़ की चोटी को ढक रहे हों। सूरज जैसे गायब है, पहाड़ पर उसके तेवर का कोई अस्तित्व नहीं। कुछ नन्हें बादल देवदार की टहनियों में उलझ गए। वो दृश्य किसी योग करके शांति पाने से कम नहीं।
मसूरी पहुँचते पहुँचते शाम हो गई। वीकेंड था, तो मसूरी भरा हुआ था। माल रोड जैसे मेला सी बनी थी। यहाँ के इमारतों में अंग्रेजी छाप साफ़ दिख रही थी। अंग्रेजो ने काफी अच्छी जगह ढूंढी अपने लिए। हर हिल स्टेशन पर आपको माल रोड मिलेगी ही। यहाँ पैदल चलने का अलग ही मजा है। काफी शौपिंग भी कर सकते हो आप। पर पहले हमें होटल खोजना था। सब भरे हुए थे। पर हमारे गुड्डू ने एक कमरा ढूँढ ही लिया। बाइक खड़ी करके हम घूमने निकल गए।
रात में मसूरी घूमने का अलग मज़ा है। हर जगह लोग दिख रहे। ठंड भी हो रही। कुछ लोग फोटो खींचा रहे। कुछ चाय पी रहे। कुछ भुट्टे खा रहे। कुछ लड़के सड़क किनारे गाना गा रहे। यहाँ हर कदम पर सड़क किनारे फोटो खिंचवाने का हवा महल जैसा बना हुआ है। वहाँ से नीचे आपको देहरादून दिखेगा। रात में देहरादून की अनेक घरों की छोटी रोशनियों आपको ऐसे लगेंगी की जैसे जुगनू का एक झुंड पूरी घाटी में अलग अलग जगह बैठ गया है। वो टिमटिमाते जुगनू सितारों की मेहफ़िल से भी ज्यादा खूबसूरत लगते हैं।
थोड़ी देर घूमने के बाद हम थक के अपने होटल चले गए। गुड्डू काफी खुश था। मैं भी खुश था। कभी कभी बिना कोई प्लानिंग के भी घूमना अच्छा हो सकता है। जहाँ ले जाए जिंदगी वैसे ही चल दो। थकान होकर भी ना जाने कितनी खुशी थी। उसी खुशी में हम दोनों पता नहीं कब चैन की नींद सो गए।
सुबह उठकर जैसे पहाड़ों का नक्शा ही बदल गया। घाटी में अभी कोहरा नहीं उठा था। थोड़ा सा हिमालय की झलक भी दिख रही थी। पहाड़ सब हरे भरे थे। कुछ चोटी खाली थीं, शायद उनपर बर्फ गिरती है। हाथ मुँह धोकर हम फिर से माल रोड आगए। वहाँ किसी ने हमें एक दोसे वाले की दुकान बताई थी। मैंने आज तक वैसा दोसा नहीं खाया होगा। इतना लाजवाब।
यूँ तो मसूरी के पास काफी जगह हैं घूमने की। जैसे कैम्पटी फाल, कंपनी गार्डन। पर समय कम था, तो हमने सोचा बाद में चलेंगे। हम वापस देहरादून जाने लगे। चढ़ना जितना असान था, उतरना उतना मुश्किल। पहाड़ों पर बाइक चलाना आसान नहीं। पर मुझे थोड़ा बहोत अनुभव था। पिताजी पहाड़ में काफी रहे। उतरने में हमने काफी जगह फोटो खींची। काफी अच्छे नजारे आ रहे थे।
देहरादून आकर हमने बाइक जमा कर दी और बस स्टैंड की तरफ चल दिये। हम दिल्ली के लिए बस ढूँढ रहे थे, तभी मेरी नजर ऋषिकेश वाली बस पर पड़ी। मैंने गुड्डू को बोला भाई ऋषिकेश यहाँ से दूर नहीं। उसने कुछ सोचा और मुझे देख कर मुस्कुरा दिया। फिर क्या हम झटपट ऋषिकेश वाली बस में बैठ गए। खिड़की से मेरी नजर एक बोर्ड पर पड़ी। उसमें केदारनाथ, बद्रीनाथ कुछ ढाई सौ किलोमीटर लिखा था। यूँ तो मैं वहाँ जा चुका हूँ, पर मैंने सोच लिया एक दिन जिंदगी में वहाँ बाइक लेकर यूँ ही ट्रिप जरूर मरूँगा।
धन्यावाद,
Ayush P Gupta
07 Aug 2026