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लेखक और उनके शब्द

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जब भी आप कोई गाना, कहानी या उपन्यास पढ़ते होंगे, तब कभी ना कभी आपको ये विचार आया होगा कि लेखक ने कैसे इतनी गहरी बात लिख दी?

हम अक्सर गाना सुनते हुए कहते हैं 'lyrics, they are awesome'। क्या खूब लिखा है, वाह वाह। हाँ मुझे भी कितनी बार खयाल आया है कि लेखक क्या सोच रहे होंगे कि ऐसे पंक्ति लिख दी। किस स्टेट ऑफ माइंड में होंगे जब ऐसा कुछ बाहर आया।

कई बार मैंने वजह जानने की कोशिश करी। क्या वो दुखी थे? क्या कोई हादसा हुआ होगा उनके साथ? क्या कोई असहनीय पीड़ा रही होगी? या फिर उन्होंने जादा साहित्य पढ़ लिया?

मैंने कई लोगों से इसपर जवाब खोजा, परंतु कुछ मतलब नहीं निकला। आजकल ऐसे लोग भी मिलने मुश्किल हैं जो ये सब समझते हों। फिर थोड़ा और ढूँढने पर मुझे कुछ जवाब मिला।

मैंने सोचा की लेखक इतनी गहरी बात कैसे लिख देते हैं? आख़िर कैसे? मुझे लगता है शायद इसलिए कि ऐसे लोगों के भीतर काफी दुःख होता है, काफी पीड़ा होती है, ऐसी पीड़ा जिसका समाधान शायद नहीं है, जिसका कभी अंत नहीं है, जो सदेव के लिए इंसान में रहता है, और शायद इंसान के मरने पे उसके साथ जाता हो। किसी ने कुछ खोया हो, कोई हादसा, बिछड़ना, ऐसे कई दुःख हो सकते हैं, जिनसे इंसान जीत नहीं सकता, और वो सदेव उनके साथ जीता है।

जब ऐसे दुःख इंसान के अन्दर कई सालों तक दबे रह्ते हैं, तब वह संगमरमर पत्थर के बनने की प्रक्रिया जैसा हो जाता है। जैसे सालों तक साधारण चुने के पत्थर, पृथ्वी की गोद में, असहनीय ताप और दबाब से, उसके हर एक कर्ण को नये रूप में विकसित कर देती हैं, ठीक उसी प्रकार से लेखक अपने दुःखों को सालों के ज्ञान और अनुभव से, इस प्रकार सुन्दर और अमर रच देता हैं कि हम आश्चर्य चकित रह जाते। शायद वो मान लेते हैं कि दुःख से बचना बेकार है। और उसी दुःख को जिंदगी के सत्य से जोड़कर, सुन्दर सी सजीव पन्क्तियों में विकसित कर देता है।

सवाल ये है, कि लेखक ही क्यूँ ऐसा कर पाते? आम इंसान क्यु नहीं? आप सोचिए यदि एक आम इंसान को ऐसा दुःख मिले तो वो कैसे इसको बतायेगा? कि मुझे दुःख है, पीड़ा है, परेशान हूँ। पर यही जब लेखक बतायेगा तब वह इस दुःख को स्वीकर करेगा और जिंदगी के सच से उसे एक अमर पंक्ति में रच देगा। जैसे 'नीर भरी दुःख की बदली' रचना।

क्या हर कोई लेखक बन नहीं सकता? बिल्कुल बन सकता है, मेरी नजर में हर इंसान लेखक है, बस शायद कलम उठाने की देरी है। पर आजकल समय जादा नहीं लोगों के पास। इंसान अब उलझ गया है। जरूरतें रोटी कपड़ा मकान से कई आगे बढ़ चुकी हैं। शायद इसी जरूरत को पूरा करने के बाद उसके पास लिखने का समय नहीं बचता। सिर्फ लिखने की ही बात नहीं, सोचने की भी है। क्या हम इतने खाली हैं, कि हम सोचें? जब सोचेंगे ही नहीं तो लिखेंगे क्या? शायद दिक्कत कलम की नहीं, सोचने की है।

मान लेते हैं आपने समय निकाला और सोचा कुछ लिखें, पर क्या? ऐसा क्या लिख दें? आखिर कुछ वजह भी तो हो? ऐसा नहीं है कि हम सबके पास कुछ भी नहीं लिखने को। हम सब के जीवन में काफी कुछ हुआ है, शायद अभी याद ना आ रहा हो। कैसे याद आये? शराब? ये एक सवाल काफी समय से मुझे था। क्या शराब के नशे में डूबने से ही हम ऐसी रचना कर सकते हैं? सुना है शराब इंसान को काल्पनिक दुनिया में ले जाती है। जहाँ उस पर कोई बंदिश नहीं होती, वो आजाद है अपनी दुनिया में। वो कुछ भी सोचे, कुछ भी करे कोई रोक टोक नहीं। तभी शायद ऐसे पंक्ति बाहर आती हैं। तभी शायद लोग इतनी गहरी बात लिख पाते हैं।

मगर ऐसा नहीं है। शराब एक अस्थाई नशा है, अस्थायी निवारण है। मुझे लगता है जब तक किसी व्यक्ती ने दुःख ना झेला हो, ना ही उसे करीब से सोचा हो, तब तक वह जिंदगी नहीं समझ सकता। जैसे ही उसे दुःख समझ आता है, वेसे ही वो जिंदगी को भी समझता है, दुःख ही जिंदगी की सचाई है। और तब ही वह उस दुःख को अपने शब्दों से एक सुन्दर माला में पिरो लेता है। शायद जितने सालों का अनुभव और ज्ञान उतना ही कम शब्दों में गहरी बात।

अतः अगली बार आप को जब भी एहसास हो, कि लेखक ने कितनी गहरी बात कही है, तो आप एक बार सोचना, कि उसने खुद कैसे वो दुःख सहा होगा , केसे समझा होगा, कि उसके ये बोल आपको जिंदगी का कडवा सच कितनी रचनात्मक तरीके से आपके ह्रदय को स्पर्श करके आपके अंदर, सदेव के लिए अमर हो गए। शायद लेखक का कर्तव्य भी यही है।

हमे उम्मीद है, कि आप भी कभी कलम उठायेंगे, और हिंदी साहित्य में अपनी रचना अमर कर देंगे।

धन्यवाद

Ayush P Gupta
04 July 2026

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Last Updated: 7/4/26, 4:25 PM
Contributors: Ayush P Gupta
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