मेरा छोटा सा बगीचा

बगीचा यानी गार्डन, हर घर को खूबसूरत बनाता है। ऐसी जगह जो इस भाग दौड़ भरी जिंदगी में सबसे शान्त कोना है। खास बात ये है इस भागते हुए शहरों में शायद यही एक ऐसी जगह होती, जिसे भागने में कोई दिलचस्पी नहीं, शायद इसे जिंदगी का रहस्य पहले से ही पता है। इस जगह रहने वाले जीव भी शान्त प्रवर्ती के होते हैं। ना शोर करते, ना कुछ माँगते, ना ही कुछ शेष खाते, बस धीरे धीरे खुद को विकसित करते रहते हैं। उन्हें ना पैसे की चिंता है, ना कामयाबी की चाहत। जिधर रख दो वही घुल मिल जाते हैं। सोचने की बात है जिन नैतिक मूल्यों के लिए इन्सान योग करता, तीर्थ जाता, किताबें पड़ता, वे सब आदर्श इनको जन्म से ही वरदान में मिले हुए हैं। अच्छा है ये बोलते नहीं, वरना इंसान इन्हें और भी जीने न देता।
मेरे घर में भी एक छोटा सा बागीचा है। इतना छोटा की शायद बैठने के लिए भी जगह कम पड़े। जिधर देखो वहाँ के जीवो ने अपने पंख फेला रखे हैं। ये पंख कभी आपकी उँगलियों में जा उलझेंगे, कभी आपके कानों को स्पर्श करके चिडायेंगे। कभी आपको आकर्षित करने के लिए रंग बिरंगे सितारे बिखेर देंगे। और कभी प्रसन्न होकर आपको प्रसाद के भाती छोटे छोटे सूरज, चाँद भी देंगे। हनुमान जी ने कभी इन्हीं सूरज को फल समझकर ग्रहण कर लिया था।
बचपन ने हम सबने राजमा या चने उगाये होंगे। वे सब काफी जल्दी उग जाते हैं। पर शायद ग्लास छोटा होने के कारण वे अपने पैर नहीं फेला पाते और परलोक सिधार जाते। उस वक्त़ हम समझ नहीं पाते थे कि इतनी देखभाल के बाद भी ये कैसे मर जाते। पर अब शायद समझ आता है कि दिक्कत हमारे लाड प्यार की नहीं थी ब्लकि उनके पैरों में पडी बेड़ियों की थी।
पर कुछ साल पहले मैंने उस गलती को सुधारना चाहा। आखिर अब ग्लास और गमले में फर्क़ समझ आने लगा है। मैंने फिर से कुछ राजमा लगाए और इस बार वो पेड़ बने। राजमा का पेड़ जादा लम्बा नहीं जाता। थोड़ा बड़े होते ही उसमे कली आनी शुरू हो गयी। उन्न कली से फली बनने का सफर काफ़ी रोमांचक होता। कलि से जब सफेद फूल आता तो मानो एक नए माली के लिए स्वर्ग का दृश्य होता। यद्यपि उसके 1 या 2 दिन बाद वो फूल झड़ जाता और एक छोटी नन्ही सी फली उसपे आने लगती।
छोटे बच्चे चाहे मनुष्य के हों या पशुओं के या फिर पेड़ पौधों के, सब ही काफी सुन्दर और मनमोहक होते। मानो सूर्यास्त की लालिमा फैली हुई है, और उसमे एक नादान परिंदा उड़ा चला जा रहा हो। या जैसे अंधेरी काली रात में एक तारा टिमटिमा रहा हो।
जैसे जैसे वो छोटी फली बड़ी होती वैसे वैसे आप उसे अपने बच्चे की तरह पालते। आप हर सुबह सबसे पहले उसे देखते। शाम में एक बार और दर्शन करते। शायद पहली बार आपको सब्जियों से हमदर्दी होती। कैसे आप बना हुआ खाना झट से बेकार बोल देते, या सीधे फेंक देते थे। शायद उस सब्जी की कुर्बानी भूल जाते थे ।
खैर अब वो फली काफी बड़ी हो चुकी है। अब आपको चयन करना होता है, उसे तोड़ने का। पर शायद आप तैयार नहीं हो। आप सोचते हो कि ऐसे ही रहने दो इसे, ऐसे ही खूबसूरत लगती। माली हमें कितना ही मना करे फिर भी हम फूल तोड़ लेते हैं। शायद अगर वो फूल हमने खुद उगाया होता तो उसे लगा ही रहने देते। आखिर आप उस फली को तोड़ लेते हो। अचानक वो फली अधिक मुल्यवान हो जाती। कहाँ आप ऐसी कितनी फली फेंक देते हो। वो एक फली आपको ऐसी लगती कि स्वंय कुदरत ने आपको आपकी मेहनत का पुरूस्कार दिया हो।

उत्सुकता और बड़ती है। आप और नये बीज़ लगाते हो। मैंने इसके बाद करेले लगाए। इसके बीज़ असानी से मिलते और आप इसको किसी पके करेले से बड़े आराम से निकाल सकते हैं। शुरू में हमारी माँ कतराती थीं, पर अब खुद बीज़ निकाल के अलग रख देती हैं। इंसान बिना प्रमाण के जल्दी यकीन नहीं करता। करेले की बेल काफी नर्म और जल्दी से बढ़ने वाली होती है। इसमे पीले फूल आते जिसकी सुगंध गुलाब से कम नहीं। सब्जी के फ़ूलों की ज्यादा कीमत नहीं हुई कभी, जबकि गुलाब के पास खुश्बू के सिवा और कुछ नहीं है।
करेले की बेल में 2 प्रकार के फूल आते। सिर्फ एक पे ही करेला बनता। जैसे जैसे करेला बड़ा होता वेसे वेसे फिर आप उसे अपना बच्चा मान लेते। आखिर पहला करेला आया है। आप भूल जाते हो इसका कड़वापन, आपके लिए ये एक मीठे सेब से कम नहीं होता। जूस तो नहीं पर हाँ सब्जी बनाकर खाया था हमनें। अपनी घर की उगाई सब्जी का रस कुछ अलग ही होता है।
ऐसे ना जाने कितने करेले आने लगे, कितनी लोकी आयी, कितनी फली आ रही होंगी अब पर आज भी इनको देखकर काफी प्रसन्न्ता होती है। बागवानी आपको काफी कुछ सिखाती है। सबसे ज्यादा धैर्य। इंसान को लगता है उसे सब चीज तुरंत मिल जाए। जैसे ही कुछ सोचे वैसे ही वो उसके सामने हो। जबकि यथार्थ विपरित है। कुछ चीजों में समय लगता है, जैसे बीज़ से पौधा और पौधे से पेड़ एक दिन में नहीं बनता। बच्चा एक दम से नहीं बड़ा होता। ऐसी ही जब आप बीज़ लगाते हो, आपको धैर्य रखना होता है। हर बीज़ भी पेड़ नहीं बनता। कभी कभी अचानक से पौधा मर भी जाता है। आपको तब दुःख भी होता है। लोग बोलेंगे इतना क्यूँ दुःखी हो रहे? अब आप बताओ क्या वो पौधा आपका कुछ नहीं था?
मेरी समझ में हर इंसान को बागवानी करनी चाहिए। कुछ सीख किताबों में नहीं मिलती। उन्हें वास्तविकता ही सिखाती है। मुझे दुःख है आज कल के शहर के बच्चे इन सबसे कोसों दूर हो गए हैं। बच्चों को इसकी समझ काफी पहले आ जानी चाहिए। यही धैर्य, करुणा, सदाचार उन्हें जीवन की कुरीतियों को सहने की शक्ति देगा।
मेरा बगीचा अब भी उतना ही बड़ा है, पर शायद मेरे और मेरी माँ के लाड प्यार ने इनकी जनसंख्या काफी बड़ा दी है। अब तो काफी प्रकार के पेड़ पौधे लगे हुए हैं। कुछ छोटे, कुछ बड़े पत्तों वाले। एक गुडहल का भी पौधा लगा है। 4-5 बार उसपे लाल फूल लग चुका है। पर ऐसे फूल बस देखने में अच्छे होते हैं। मुझे आज भी सब्जियों के फूल ज्यादा पसंद हैं।
याद आया इसपे मैंने 2 पंक्ति भी लिखी थी, ज़रा गौर फर्माइयेगा,

"दुनिया तुम्हें गुलाब का फूल देती होगी,
हम तुम्हें तुराई का फूल देंगे प्रिय।"
हाँ काफी हास्यजनक है।
आज भी हर सुबह मैं अपने बगीचे जाता हूँ। गुड़ाई करता हूँ, पानी डालता हूँ और थोड़ी मन ही मन गुफ़्तगू भी करता हूँ। कुछ बेले आज भी मेरे कान में घुसकर मुझे चिढ़ाती हैं। उन्हें देख कर अब ऐलो वेरा भी मुझे काटे चुभा देता। काटे जोर से चुभते हैं, पर मुझे उनके पीछे का स्नेह, कुछ पीड़ा का एहसास नहीं होने देता।
कुछ और बेलें अब काफी ऊँची होकर छत्त छूने लगी हैं। मैं नहीं चाहता, मैं उन्हें आसमान की बुलंदियों को छूने से रोकूं। उन्हें अब अपना रास्ता खुद ही ढूँढना होगा। मुझे विश्वास है वो ढूँढ ही लेंगी।
धन्यवाद,
Ayush P Gupta
07 July 2026