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हजरतगंज की सवारी

Cover Image

आज सोचा कि हजरतगंज घूम आते हैं। हजरतगंज हमारे लखनऊ का एक खास हिस्सा है। जैसे दिल्ली का कॅनॉट प्लेस हो गया वैसा ही लखनऊ का हजरतगंज मान लीजिए। प्रसिद्ध शाम-ऐ-अवध आपको यहीं देखने को मिलेगा। जितना पुराना अवध का इतिहास है, उतना ही पुराना हजरतगंज भी। हालाँकि अब नए निर्माण कार्य होने से आपको इतिहास की झलक थोड़ी कम दिखाई देगी।

लखनऊ में मेट्रो आने से पहले हजरतगंज जाना सरल नहीं था। आपको कई ऑटो बदलने से लेके, कई ट्रैफिक जाम का सामना करना पड़ता। शायद आधे रास्ते में ही आपका मन ऊब जाये। आप कहेंगें अपने वाहन से चले जाते हैं, पर यहाँ पर पार्किंग की काफी समस्या है। अतः अगर आप दूर रहते हों तो आपका मन यहाँ आने का कम ही करेगा। पर जब से मेट्रो आयी, हजरतगंज आना काफी सरल हो गया। मेट्रो की ठंडक, और बिना किसी ट्रैफिक में फंसे आप चंद मिंनटो में हजरतगंज आ जायेंगे।

हजरतगंज मेट्रो स्टेशन के अंदर ही आपको काफी रोचक चीजें दिखेंगी। जैसे कि एक बड़ा सा बुक स्टाल, एक तरफा हजरतगंज का इतिहास लिखा हुआ, और कभी कभी पुरानी फोटो लगी हुई दिखेंगी। बाहर निकलने के चार गेट हैं। एक साहू सिनेमा के पास खुलेगा। ये लखनऊ का काफी पुराना सिनेमा हॉउस है। दूसरा गेट रॉयल कैफे पर खुलता है। यहाँ बिना कुछ खाए आप जा ही नहीं पायेंगे। तीसरा चर्च पे खुलता है। क्रिसमस पर बहुत भीड़ होती इधर। काफी बड़ा चर्च है। और चौथा नाज़ा मार्केट की तरफ खुलता। यह लखनऊ का सबसे बड़ा कंप्युटर मार्केट है। बचपन में यहाँ गेम की सीडी लेने की काफी उतावली होती थी। अपना पहला कंप्युटर मैंने यही से लिया था।

जब कभी पैदल घूमने का मन हो तो मैं हजरतगंज आ जाता हूँ। शाम को यहाँ घूमने में काफी आनंद आता। मैं ज्यादातर नाज़ा वाले गेट से बाहर निकालता हूँ। यहाँ पर कुछ बेंच पड़ी हुई हैं। कुछ देर यहाँ बैठकर काफी अच्छा लगता है। कुछ लोग मोमोज खा रहे, कुछ आइस क्रीम। सामने सड़क पर काफी ट्रैफिक है। कुछ की गाड़ी अवैध पार्किंग की वजह से टो हो गयी। कुछ रिक्शावाले अमीनाबाद की सवारी खोज रहे। कुछ लोग शॉपिंग कर रहे। काफी शोर है। लगातार पुलिस के साइरन बज रहे। पर जब भीतर का शोर ज्यादा हो, तो बाहर का शोर कम सुनाई देता है। खैर थोड़ा बैठने के बाद मैं आगे चल पड़ा।

आगे आपको एलआईसी, और रेल्वे के दफ्तर मिलेंगे। उसके साथ साथ सरकारी आदमी पंचायत करते भी। ऐसा लगता बस देश यही चला रहे हों। ऐसा सोचकर मैं थोड़ा मुस्कुराया और फिर आगे बड़ा। अब आप वापस रॉयल कैफे पहुंच जाओगे। वहाँ मेट्रो की सीढ़ी पर आपको कुछ लोग पेंटिंग करते दिखेंगे। कोई वाटर पैंट कर रहा, कोई पेंसिल से स्केच बना रहा। मेरी आर्ट्स में रुचि होने के कारण मैं उनकी पेंटिंग देखने लगा। एक तो लाइव स्केच बना रहा था। एक दम हूबहू। पर समझ नहीं आता ये सभी आर्टिस्ट के बाल इतने लंबे क्यों होते हैं? खैर आगे चलते हैं। रॉयल कैफे पर आप चाट, घेवर, मक्खन मलाई आदि काफी कुछ खा सकते हैं। कितना भी मन मारें पर आप का मन उस भीड़ में ललचा ही जाएगा। थोड़ी देर आप यहीं रुकें।

ज्यादा ना खायें, अभी आगे आपको मोती महल मिलेगा। यहाँ पानी के बताशे खायें। इधर तो मन ललचा ही जायेगा। लखनऊ अच्छे खाने पीने के लिए काफी प्रसिद्ध है। चाहे आप नॉन वेज हों या वेज। यहाँ आपको खाना एक से एक मिलेगा। अभी आपको आगे और भी बढ़िया खिलाते हैं। आगे चलेंगे तो आपको बुक स्टॉल दिखेगा। यहाँ हजरतगंज में काफी बुक्स मिलती हैं। कुछ दुकानों के अंदर, कुछ सड़क पर कपड़ा बिछाये बेच रहे। मर्जी आपकी जहाँ से भी लो, किताब और उनका ज्ञान एक ही जैसा मिलेगा। सोचता हूँ अपनी पहली प्रकाशित पुस्तक यहीं इनको दूँगा। पर इतनी किताबों के बीच मेरी किताब बिकेगी?

हजरतगंज चौराहा आ गया। अब सड़क की दूसरी और चलते हैं। यहाँ दाक्षिण मुखी हनुमान जी का मंदिर है। मंदिर छोटा है, सड़क पर ही है। आप बिना अन्दर जाये बाहर से ही वार्तालाप कर सकते हैं। वहां हनुमान जी की दो मूर्ती हैं, एक बाये, और एक दायें। चयन करना मुश्किल है आप किससे वार्तालाप करें। खैर दोनों एक ही हैं।

थोड़ा आगे चलेंगे तो आपको कुछ लड़के गाते हुए मिलेंगे। उनमे एक गिटार बजा रहा होगा। ये बस अपने मनोरंजन में गा रहे। काफी लोग घेरा बना के सुन रहे। अचानक एक पुलिस अफसर आता है, और इन्हें भगा देता है। जिस तरह से भगाया ऐसा लगा जैसे बोल रहा हो, जाकर पढ़ाई करो, इन सब में कुछ नहीं रखा। अफसोस गाना आधा सुने ही हम आगे बढ़ते हैं।

यहाँ काफी कपड़ों की दुकाने हैं। काफी औरतें की भीड़ लगी हुई है। एक गली है जिसमें काफी लोग दिख रहे। गालियों में अक्सर काफी सस्ता सामान मिलता है, तभी यहाँ इतनी भीड़ है। आगे चले तो एक मोड़ है। यहाँ शुक्ला चाट है, और वाजपेयी पूरी की दुकान है। शायद लखनऊ की बेस्ट चाट और पूरी यहीं मिलती है। जब भी हम इधर से निकलते तो चाट और पूरी जरूर लेकर जाते। और आगे जायेंगे तो राम आसरे की दुकान दिखेगी। वहाँ आप मलाई पान जरूर खायें। सब कुछ खाने के लिए आपको हजरतगंज कम से कम दो तीन बार आना पड़ेगा।

आगे चलें तो कुछ लड़के अपनी कॉफी बेच रहे हैं। शायद कोई नया बिजनस या स्टार्ट-अप शुरू करा है। आवाज लगा लगा कर बुला रहे। कुछ लड़कियाँ हैंडलूम का सामान बेच रहीं। ऐसा लग रहा जैसे खुद घर से बनाकर लायी हों। एक छोटी टेबल और उसपे उनका सामान सजा हुआ है। कुछ पेपर कार्ड, की-रिंग, पंखा आदि रखा है। देखकर काफी अच्छा लगा। फिर उन सबको देखकर याद आया कि बेचने का पहला नियम बेशरम बनना होता है। ऐसे ही कई नव युवक आपको यहाँ तरह तरह के सामान बेचते दिखेंगे। अच्छा ही है, नौकरी वैसे भी दिन प्रतिदिन कम ही हो रही हैं।

चर्च आ गया। काफी भीड़ है। लगता है कोचिंग छूटी है। बच्चे आपस में हस रहे, कुछ मोमोज खा रहे। कुछ मोबाइल पर पिक्चर देख रहे। इनका आगे भविष्य कैसा भी हो पर लग रहा इनकी यादें काफी अच्छी होंगी।

आगे फिर कुछ बेंच पड़ी हुई हैं। मैं अक्सर यहाँ भी बैठ जाता हूँ। कई लोग मिलते हैं। एक बार एक पुराने दोस्त का दोस्त मिला। एक बार एक दवाई उद्योगपति मिले। कुछ से बात हो जाती। कुछ किसी का इंतेज़ार कर रहे होते। कुछ शान्त बैठे रहते। और कुछ हमारी तरह सामने सड़क देख रहे होते। शायद खुदी को खुद से मिला रहे होते।

धन्यावाद,
Ayush P Gupta
23 Aug 2026

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Last Updated: 8/23/26, 2:59 PM
Contributors: Ayush P Gupta
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