एक पटरी का सफर

आज अचानक से मेरा मन हरिद्वार जाने को हुआ। देखा तो ट्रेन का टिकट मिल रहा था। झटपट मेरी बहन ने टिकट करा दी और मैं सुबह चार बजे स्टेशन के लिए निकल पड़ा। लखनऊ रात में एक अलग ही शहर मालूम पड़ता है। हालाकि मैं बचपन से यहाँ रह रहा हूँ, पर रात में लखनऊ घूमने का अवसर कम मिला। वो सड़कें जो दिन में गाड़ियों के बोझ और शोर से दबी रहती, वही रात में काली होकर भी चमक उठती हैं। मानो सफेद पट्टी रूपी आभूषणों पहनकर हमें अपनी सौंदर्य प्रदर्शन कर रहीं हों। ठंडी हवा, खाली सड़कें और शांत बहती नदी हमें थोड़ा थम जाने को कह रही हों।
स्टेशन पहुचते ही ट्रेन सामने खड़ी थी। क्यूँकि मैं जल्दी आग्या तो ट्रेन के दरवाजे बंद थे। मैं एक बेंच पर बैठ गया। यात्रियों को देखने लगा। मन में कई बार आता कि लोगों से पूछूँ कहाँ जा रहे। कुछ युवकों का दल शायद ट्रेक पे जा रहा था। उनमे से एक व्याकुल हो रहा था कि हम कब पहुंचेंगे। शायद पहली बार ट्रेक पे जा रहा था। लोग मंजिल की चाह में उसके सफर का आनंद लेना भूल जाते हैं।
दरवाजे खुले तो, सब एकाएक दौड़ने लगे। सबको लगता हम प्रथम आ जायें। हम भारतीयों में सब्र की बहुत कमी है। ऐसा लगता हर चीज में दौड़ की प्रतियोगिता लगी हुई है। प्रथम नहीं आए तो आप हार गये। बचपन से इसी दौड़ का डर दिखाया दिया जाता है। मैं बाहर ही रुका रहा कुछ देर। मुझे उस दौड़ में कोई दिलचस्पी नहीं। कुछ मिंटो बाद मैं अपनी सीट पर बैठ गया। इत्तेफाक से वो ट्रेक वाला दल मेरे पीछे वाली सीटों पर बैठ गया।
ट्रेन का सफर मुझे काफी पसंद आता है। जैसे कोई सिनेमा चल रहा हो। खिड़की के बाहर लहराते खेत, कुछ भागते हुए बच्चे, कुछ सोते हुए लोग, कुछ पालिटिक्स। ऐसा लगता आपको जबरदस्ती बैठाया गया हो। आप कुछ खास कर नहीं सकते। बस बैठे बैठे सोचते रहते हो, या आलस में डूबे रहते हो। यदि आप अकेले नहीं हो तो सफर छोटा हो जाता है। पर मुझे अकेले सफर में काफी आनंद आता। ये वक्त़ शायद मैं खुद से मिलता। मुझे खुद पर सोचने को मजबूर किया जाता। मन को काफी शान्ति मिलती है।
ट्रेन थोड़ी देर रुक गयी। मैंने खिड़की के बाहर देखा तो बगल वाली पटरी पर कुछ काम चल रहा था। कुछ देर पटरी को देखने लगा और सोचा आखिर पटरी की जिंदगानी क्या है? इंसान ने तो उसे वहाँ गाड दिया। अब उसे धूप, बरसात, जाड़ा सब झेलना है। उसे आखिर क्या उम्मीद होती होगी? इंसान ने तो उसे ऐसा गाडा की वो हिल भी नहीं सकती। क्या वो रेल गाड़ी की प्रतीक्षा करती होगी? हर रेल गाड़ी उसे कुचलती हुई जाती। वो बिना कुछ शिकायत के दबती रहती।
शायद उसे खुशी मिलती होगी जब ऊपर ट्रेन में बैठे मुसाफिर अपनी मंजिल तक पहुच जाते हैं। पर उसकी य़ह करुणा किसे समझ आती। इंसान धन्यवाद इंजन का देता, ट्रेन के डब्बे का देता। पर पटरी को भूल जाता। कितनी पटरियां एक जुट होकर अपना कर्तव्य निभाती, यदि एक ने भी धोखा दिया, तो ना जाने कितनी जाने जायेंगी।
मैं पटरी का काम देख ही रहा था, कि अचानक मेरी नजर उन्न पुरानी पटरियों की ढेर पर पड़ी। कुछ अभागी पटरियां रेल्वे लाइन का हिस्सा नहीं बन पाती। वे कई सालों तक वहीं एक तरफा पडी रह जाती। उन्होंने भी धूप बारिश सब सहा, पर कभी अपना कर्तव्य नहीं निभा पायी। पूरी उम्र उन्हें रेल का हिस्सा बनने की उम्मीद रहती। ऐसा नहीं उनमें कुछ कमी है। बस उन्हें अपनी काबिलियत दिखाने का मौका नहीं मिल पा रहा।
भले ही उन पटरियों ने कभी भार नहीं उठाया, पर फिर भी उनमे काफी जंक लग गया। जबकि रेल वाली पटरी चमक रही थीं, शायद वो ट्रेन जो बोझ लगती है, वहीं उन्हें जीवित रखती है।
काम चल ही रहा था, और एक पटरी निकाल कर बाहर फेंक दी गयी। पटरी कुछ नहीं बोली, ना ही उसने शिकायत करी। शायद उसे एहसास होगया की उसका कर्तव्य पूरा हुआ। दुःख हुआ, कि उसके सहयोगी भी कुछ नहीं बोले। ना ही उसे रोका। पर उस पटरी का जीवन पूरा नहीं हुआ। कमाल है, बिना कुछ शिकायत के उसने अपना कर्तव्य पूरी ईमानदारी से निभाया पर इंसान ने उसे सही से विदाई नहीं दी। उसे कचरे के भाती एक कोने में फेंक दिया। जहाँ वो फिर से धूप में तपेगी, फिर से बारिश में गलेगी और जंक रूपी कीड़े उसको वापिस उस धरती में मिला देंगे। उसके लिए उस धरती में वापस मिलना मोक्ष से कम नहीं होता होगा।
इतना सोच ही रहा था कि अचानक हॉर्न बजा और हमारी ट्रेन चलने लगी। वो ट्रेक वाला दल अबी सोया हुआ था। उन्हें रात में ऋषिकेश घूमना था, अतः सोना जरूरी था। मुझे भी हल्की हल्की नींद आने लगी। जैसे जैसे ट्रेन आगे बड़ी, मैंने आखरी बार उस पुरानी पटरी को देखा। वो एक दम शाँत ठंडी सी पडी थी। किसी और ने ना सही, मैंने उसको अपना कर्तव्य निभाने के लिए तहे दिल से धन्यावाद दिया। और एक ही क्षण बाद मुझे नयी पटरियों का ढेर दिखाई पड़ा।
धन्यवाद,
Ayush P Gupta
17 July 2026