काले फर्श

आज में जिम की सीढ़ियों पर बैठा था। सीढ़ी मार्बल की बनी थी। लेकिन उसपे काला रंग कर रखा था। पहली सीढ़ी का पत्थर कोने से टूटा हुआ है। पर क्या उससे सीढ़ी को फर्क़ पड़ा? शायद नहीं। किसी ने ध्यान भी नहीं दिया होगा। इंसान हमेशा फर्श पर खड़ा होता है, पर उसकी नजरें हमेशा छत को ही देखती है। उसने कभी फर्श को सम्मान ही नहीं दिया। दिवारों पर तो हर साल नया रंग करवाता, पर फर्श पर उसको दया नहीं आयी। मैंने सोचा क्यूँ ना फर्श पर ही कहानी लिख दूँ, शायद उसके मन का भार कुछ कम हो जाए।
धरती माँ ने हमें मिट्टी की जमीन दी। और उसपर फर्श के नाम पर सुन्दर हरी घास दी। नंगे पेर कभी घास पर चलें, काफी आनंद आता है। इंसान का भार शायद घास ना झेल पाती, इसलिए उसने सीमेंट के फर्श बिछाने शुरू कर दिए। वे काले काले फर्श में भले ही सुंदरता ना हो, पर मजबूती काफी थी। ना जाने कितने किलो का भार सह लेता। आप उसपर कितना भी पोछा रूपी श्रृंगार कर दो, वो वैसा ही काला दिखेगा। उसे सजने का कोई शौक नहीं। मेरे दादी के घर में आज भी वही काले फर्श के दर्शन होते हैं।
कई दौर तक ये काले फर्श इंसान के घरों की शान बढ़ाते रहे। ये सस्ते और टिकाऊ थे। फिर इंसान अमीर हुआ और उसने अपने घर को ताजमहल बनाना चाहा। मार्बल का चलन आ गया। मेरे अपने घर में मार्बल लगा हुआ है। बचपन में ये नए नए मार्बल काफी चमकते थे। मार्बल काफी मजबूत होता है और हीरे की तरह चमकता भी है। मार्बल भी कई प्रकार के आते। जितना ज्यादा सफेद और साफ़ उतना महँगा पत्थर। बस एक चाँद ही है जिसमें धब्बे होने के बाद भी उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
फिर टाइल्स का ज़माना आ गया। मार्बल की चमक फीकी पड़ने लगी। टाइल्स तो हीरे से भी ज्यादा चमकती। ना जाने कितने रंग और प्रकार की आती। भले ही थोड़ी कमजोर हों पर इंसान के लिए सुंदरता ज्यादा मायेने रखती है। कुदरत के ना जाने कितने पत्थर उसके सामने फीके पड़ गए। फिर भी आपको कुछ पुराने घरों में आज भी मार्बल और सीमेंट के काले फर्श दिखाई देंगे। उनपर चमक नहीं ब्लकि स्मृति की रेखाएँ खिची दिखेंगी।
फर्श कोई भी हो, उसने सदेव बिना कुछ बोले इंसान का भार उठाया है। बचपन में बच्चे का गिरना, बार बार खड़ा होना, उसके खिलौने बिखरे होना सब इसी फर्श ने देखा है। बच्चे हो या बड़े या बुढ़े उसने किसी में भेदभाव नहीं करा। सबको अपने कंधे पर बिठाया। कुछ को तो मुक्ति भी इसी ने दिलाई। फर्श ने इंसान की हर खुशी भी देखी है और हर दुःख भी झेला है। दिवाली की रंगोली भी देखी, होली में बिखरे रंग भी। कभी कभी बर्तनों की मार भी सही। बर्तन के गिरने से आवाज तो आयी, पर फर्श इतना मजबूत था, कि बर्तन ही चीख पड़े। फर्श पर लोग नाचे भी, और दुख में शांत भी बैठे। कोई खुशी से उछला उसपे, कोई बंद कमरे में उसपर सिसक सिसक कर रोया भी।
फर्श कितना ही मजबूत क्यूँ ना बना हो, पर सालों से भार उठाते उठाते वो भी थक गया है। काले सीमेंट के फर्शो में दरार आनी शुरू हो गयी। कुछ भाग उखड़ने भी लगे हैं। शायद उसकी जिम्मेदारी पूरी हो गयी। वो जाना चाहता है, पर मनुष्य को अपने दर्द के अलावा किसी और दर्द नहीं दिखता। मेरे घर के मार्बल भी अब घिस गए हैं। उसमे अब वो चमक नहीं रही। हल्के गड्ढे भी होगए हैं। शायद मुझे चमकाते चमकाते उसने खुद चमकना छोड़ दिया। उसकी एक एक खरोंच पर मेरे जीवन की एक एक कहानी गड़ी हुई है। उसको आज मुझ पर मेहनत करने का नाज़ तो होता होगा। मैं भी सोच रहा बदले में उनपर पोलिश करा दूँ।
अच्छे फर्श केवल सुंदरता नहीं दर्शाते, ब्लकि इंसान और घर का चरित्र भी दिखाते। इसलिए हम अपने घरों में हर रोज उनपर पोछा करते हैं। भले ही वो चमके ना पर साफ़ तो दिखें। मेरे दादी के घर के फर्श आज भी काले ही रह गए। बचपन में मेरे पिताजी ने काफी कोशिश करी उनपर मार्बल बिछवाने की, पर मुझे लगता था दादी को काले फर्श ही पसंद थे। अब बड़े होकर समझ आ रहा कि वे फर्श आज भी काले क्यूँ रह गए। अब शायद पिताजी के साथ साथ मुझे भी काले फर्शो से चिढ़ हो गयी है। पर सोचता हूँ जिन फर्श ने मुझे चलना सिखाया, उससे मैं नफरत कैसे कर सकता हूँ।
कल फिर से मैं उस सीढ़ी पर बैठूँगा। फिर से टूटा हुआ कोना देखूँगा। भले ही मैं उसे ठीक नहीं कर सकता, पर शायद उसकी कहानी समझकर अब वो मुझे टूटा हुआ और भी अच्छा दिखाई देगा।
धन्यवाद,
Ayush P Gupta
14 July 2026