पॉकेट
कभी ऐसा हुआ है कि आपने अपनी जेब में हाथ ड़ाला हो और वो चीज है ही नहीं? अक्सर हुआ होगा। मानो आपके दिल की धड़कन रुक सी गयी हो। मानो एक साथ हजारों नजारे आपकी आँखों के सामने से गुजर रहे हों। आखिर वो कहाँ गयी? घर पर भूल गए? या कहीं गिर कर खो गयी। मेरे मन में भी ऐसे ही कुछ बेचैनी हुई थी जब मुझसे एक बार चाबी खोई थी। उस वक्त़ शायद ही कोई चीज इंसान के लिए ज्यादा कीमती होती है।
जेब की जरूरत इंसान को जल्दी पता लग गयी थी। मंगोल वाले अपने लंबे सफर में इसमे कीमती रत्न लेकर चलते थे। फिर पैसा आया तो इसमे सिक्के, कौडिय़ां रखने लगे। फिर अंग्रेजो ने इसमे पॉकेट वाच, रुमाल रखनी शुरू कर दी। और फिर लोगों ने कंघी, चाबी, पुड़िया रखनी शुरू कर दी। व्यापरियों ने इसमे पुर्जी रखी, लेखकों ने कलम। बच्चों ने टॉफी रखी, और बूढ़ों ने अपनी यादें। वैसे ज्यादातर बूढों के पास आपको चश्मा या पासबुक ही दिखेगी। युवकों की जेबे अब थोड़ी हल्की दिखाई पड़ती है। ऐसा नहीं जिम्मेदारियाँ कम होगयी। पर जब से डिजिटल पेमेंट आया है, तब से जेबों में सिक्कों की खनक भी कम होयगी है। अब पॉकेट में सिर्फ मोबाइल फोन ही दिखता।
औरतों को कभी जेब नहीं मिली। इसका रहस्य आज तक नहीं समझ आया। क्या उन्हें कभी कुछ रखने कि जरुरत नहीं पड़ी? शायद उन्हें पॉकेट छोटी पड़ी होगी। तभी उन्होंने विशाल पर्स रखना शुरू कर दिया। वहां सेंकड़ों पॉकेट मिलेंगी। उस गुफा में एक अलग ही दुनिया बसी हुई है। वो जगह शॉपिंग मॉल से कम नहीं होगी। हर पुरुष को लगता है उसमे कुछ काम का नहीं है, पर औरतों के लिए उनकी पूरी कायनात उसमे समायी है।
बच्चों की जेब भी उन्हीं के जैसी कच्ची होती है। बच्चे उसमे रबर, कुछ रंगीन पत्थर, टाफी, बीज़, कंचे ना जाने क्या क्या लिए फिरते। जिनमे से आधी चीज खो जाती हैं। ऐसा हो नहीं सकता आप कुछ बच्चे को रखने को दें और वो गिरा ना दे। मैंने जिद्द करके अपनी स्कूल की फोटो रखी थी, और वो घर आते आते छू मन्तर हो गयी। पता नहीं पॉकेट छोटी थी या हाथ गहराई में नहीं जाता था।
जब बच्चे का रुमाल उसके कंधे की पिन से उसकी जेब में चला जाए तो समझिएगा वो बड़ा हो गया। अब जेब से सामान नहीं खोता। उसमे लक्ष्मी जी का भी वास होना शुरू होगया है। जो कि बस स्कूल के बाहर किसी रेडी वाले की जेब चली ज़ाती। माँ जब कपड़े धोती तो अब उसमे मिट्टी, या आधी खायी चौक नहीं मिलती। अब वो हर दिन नयी दुनिया नहीं रखकर लाता।
धीरे धीरे पॉकेट और बड़ी और गहरी होने लगती। उसमे सामान के साथ अब जिम्मेदारी भी आने लगती हैं। डॉक्टर की जेब में दवाई आगयी, मिस्त्री की जेब में पेचकस, लेखक की जेब में छोटी डायरी आगयी। पर जेब कोई भी हो, किसी की भी हो, पैसे ने उसका कभी साथ नहीं छोड़ा। कुछ की जेबे जल्दी भर जाती और कुछ की कर्जे में डूबी रहती। कुछ जेबें लालची हो गयीं। लोगों को पेट काटकर दूसरों की जेबे गरम करनी पड़ रही हैं। कुछ की जेबे खाली रह गयीं, वहां इच्छाओं ने डेरा जमा लिया। खाली जेबे इंसान को बहुत सिखा जाती हैं।
इंसान की तरक्की आज भी उसकी जेब के वजन से ही होती है। जितनी भारी जेब उतना सफल व्यक्ती। कुछ की इज़्ज़त भी जेब से नापी जाती है। तभी शायद सब अपनी जेबे भरने में लगे रहते हैं। जेब इतनी भी भारी ना कर लें कि आगे चलना मुश्किल हो जाए। कुछ लोग इस लालच में जेब ढीली करना ही भूल गए। समय समय पर दान करते रहना चाहिए।
जिंदगी भर ये जेब इंसान को ना जाने क्या क्या करवाती। कुछ तो जेब कतरे भी बन जाते। हमे सिखाया गया है कि दूसरे की जेबों में हाथ नहीं डालते, पर ये चोरों को दूसरों की जेबों में हाथ डालने का बहुत शौक है। कुछ चोर तो ऐसे हैं जिनको कुछ चुराने का मकसद नहीं, बस उन्हें दूसरों की जेब टटोलने में मजा आता। इंसान अपनी जेब से ज्यादा दूसरों की जेबे झांकने में लगा रहता है।
जिंदगी भर इंसान ने अपनी जेबे भरने के लिए क्या कुछ नहीं किया। उस जेब से उसने महल बनाया, गाड़ी ली, और ना जाने कितने सपने पूरे करे। कुछ लोग जेब भरने में इतना मगन होगए की सपने देखना ही भूल गए। पर जिंदगी आपने कैसे भी जी हो, आपकी जेब कितनी ही भारी क्यूँ ना हुई हो, आखरी वक्त़ पे इंसान को कफन में बाँधा जाता, जिसमें कोई जेब नहीं होती। ये सच उसे हमेशा से पता था, पर शायद आँखों पर लोभ ने चादर ढ़की हुई थी। उसकी आत्मा को अपनी जेब खाली करते देख कितनी पीड़ा होती होगी। मृत्यु का सच इंसान स्वीकारना ही नहीं चाहता। एक दिन सब यही रह जाना है। पर फिर भी ये बात उसकी चिता में खड़े लोगों को कहाँ समझ आती है।
धन्यवाद,
Ayush P Gupta
13 July 2026