पीपल का पेड़

मेरे घर के ठीक सामने एक विशाल पीपल का पेड़ है। वह इतना समीप है कि अगर बाल्कनी से जारा सा हाथ बढ़ाओ तो वो भी आपसे हाथ मिलाने से पीछे नहीं हटेगा। वह काफी विशाल पेड़ है। ना जाने कितने ही पक्षियों का निवास स्थान है। कितने अन्य लघु जीव उस पर जीवन क्रीड़ा करते मिलेंगे। कभी कभी बन्दरों का भी आना जाना लगा रहता है। इसी बहाने आप जमूरे का करतब किसी लाइव शो की तरह घर से ही देख सकते हैं। पर हाँ थोड़ा सावधान रह कर देखें।
आज से करीब बीस साल पहले हम इस घर में आए थे। बीस साल मतलब अब पच्चीस हो या तीस, हम उसे बीस साल ही कहते आये हैं। तब यह पेड़ छोटा था। हमारी बाल्कनी तक नहीं आया था। पेड़ के उस पार का नजारा काफी आसानी से दिख जाता था। तब मैं भी छोटा था। इतना छोटा की बाल्कनी की रैलिंग भी मुझसे ऊँची थी। हवा चलती तो पेड़ की कुछ टहनियाँ बाल्कनी को छूने लगती थीं। मैं हर बच्चे की तरह उसे छुना चाहता और कुछ पत्तियाँ तोड़ना चाहता था। पर घर वाले तोड़ने नहीं देते थे, ब्लकि पत्तियों को माथे से लगाने को कहते थे। उस वक्त़ समझ नहीं आता था ऐसा क्यों।
जैसे जैसे हम साथ बड़े हुए, पेड़ और विशाल होने लगा। जिस प्रकार से बच्चे की उँगलियाँ अब पहले से थोड़ी मोटी हो गयीं, उसी तरह से पेड़ का तना भी बड़ा और मोटा हो गया। शाखाएँ और बड़ीं, और ज्यादा फैल गयीं। पेड़ और हरा भरा हो गया। हर साल ना जाने कितने तरह के नायाब पक्षी इस पर बसेरा करने आते। कुछ की लंबी पूँछ है। कुछ बिल्कुल नीले से। कुछ मोर जैसे सिर पर मुकुट धारी। ऐसे ऐसे पक्षी देखने को मिलते जो आपने किसी बर्ड सेंचुरी में ना देखे होंगे। फोटोग्राफी का भूत मेरे को इन्हीं पक्षियों की देन है।
इन कई सालों में काफी कुछ देखने को मिला। कभी इस पेड़ पर मधुमक्खियों ने भी डेरा जमाया था। काफी बड़े बड़े छत्ते लटकते थे। धूप, बारिश, आँधी, तूफान आए पर छत्ते लटके रहे। उस छत्ते पर मधुमक्खी लगी हुई ऐसे लगती थी जैसे गुड़ की चिक्की। बस उसमें मूँगफली थोड़ी ज़्यादा डाल दें। कितनी भी विपरीत परिस्थिति आयी हो, पर मनुष्य के लालच के आगे सारे पशु हारे हैं। एक दिन एक व्यक्ती धुएँ की झाडू लेकर पेड़ पर चढ़ा और मधुमक्खी से उसका घर छीन लिया। फिर नीचे उतरकर उसका शहद बेचने लगा। लेकिन हमने शहद नहीं लिया, जबकि हमने उसके उत्पादन की शुद्धता अपनी आँखों से देखी थी। हमारी माँ का कहना है, पीपल के पेड़ पर भूत रहते हैं, इसलिए हम शहद नहीं लेंगे। अब इस विचारधारा का विरोध मैं भी नहीं कर पाया। पर कुछ शहद की बूँदें नीचे खड़ी मेरी बाइक पर गिर गयी थीं।
हर साल पतझड़ का मौसम आता है, और पेड़ एक दम खाली हो जाता है। ये चीज जितना किताब में पढ़ी थी, उससे ज्यादा इस पेड़ ने लाइव दिखा दी थी। पेड़ की एक एक पत्ती झड़ जाती। पूरी जमीन सूखे पत्तों से भर जाता। ऐसा लगता मानो पेड़ का कंकाल रह गया हो। पर कुछ ही दिनों में छोटी छोटी हरी कलियाँ आने लगती। पत्तियों का खिलना किसी फूल के खिलने से कम नहीं। सेंकड़ों नन्ही कलियाँ खिलती हुई ऐसी लगती थी मानो सैकड़ों छोटे बच्चे एक साथ हर टहनियों पर जन्म ले रहे हों। आप धीरे धीरे उन्हें अँगड़ाई लेते हुए खिलते देख रहे हों। मानो एक तितली अपने कोकून से बाहर आ रही हो। छोटी छोटी हरी हरी पत्ती हीरे समान हर डाल पर सजी हों। मानो पेड़ ने एक बार फिर से जन्म ले लिया हो।
पेड़ अडिग रहा। ना जाने कितने तूफान आए। कितनी बार पेड़ को झुकाया पर वो नहीं हिला। कई बार तो हमने पेड़ को पूरा ही झुकते देखा, हमें लगा अब उखड़ा, पर शायद उसने तूफान से लड़ना सीख रखा था। एक दिन कुछ लोगों ने उसके कुछ मोटे तने काट दिए। उन्हें वहाँ दूसरी मंजिल बनानी थी। शनिचर का दिन था जब तने काटे गए। मंजिल के पिलर तो पड़ गए, पर कभी काम पूरा नहीं हो पाया। आज भी इतने साल बाद ढांचा वैसा ही खण्डर पड़ा है।
ना जाने ऐसी कितनी ही कहानी इस पेड़ से जुड़ी हैं। कभी कपड़े उड़कर इस पर फँस जाते। फिर बड़ी मुश्किल से डंडा मार कर, या रस्सी से खींचने पड़ते। कभी इसपर चढ़कर बन्दर आ जातें। एक बार तो एक बन्दर घर में भी घुस गया था। कभी कभी गिल्लू यानी गिलहरी भी आ जाती। कभी कुछ पक्षी के घोंसले दिख जाते। गर्मी में कोयल का गाना। शाम को कौव्वों की कोउ कोउ। कभी गोरैया की ची ची। भले ही हम शहर में रहकर प्रकृति से दूर हों, पर इस पेड़ ने हमें ऐसा एहसास नहीं होने दिया।
पेड़ के साथ साथ अब मैं भी बड़ा हो गया हूँ। मेरी दुनिया काफी बदल गयी है। पेड़ और उसपर रहने वाले जीवों की भी दुनिया कुछ बदल गयी है। मधुमक्खी जा चुकी हैं। पक्षी अब कम हो गए हैं। गिल्लू भी अब नहीं दिखाई देते। पर पेड़ आज भी अपना अडिग है। कुछ लोग उसकी पूजा भी करते हैं। शाम को उसके नीचे दिये भी जलते दिखाई देंगे। आते जाते अब मैं भी पेड़ के समक्ष अपना सर झुका लेता हूँ। पत्तियों को अब तोड़ना नहीं चाहता, ब्लकि माथे से स्पर्श कर लेता हूँ। अब मुझे समझ आ रहा ऐसा करना हमें क्यूँ सिखाया गया था।
धन्यावाद,
Ayush P Gupta
09 Aug 2026