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बक्सा

Cover Image

हर भारतीय परिवार के घर में एक टीन या लोहे का एक बड़ा बक्सा जरूर मिलेगा। चाहे कितना अमीर परिवार क्यूँ ना हो, घर के किसी एक कोने में ये भारी बक्सा जरूर रखा मिल जाएगा। कुछ काम का सामान शायद ही हो इसमे अब, पर इसको, और सामानों के मुकाबले ज्यादा इज़्ज़त दी जाती है। कोई इसे छू भी नहीं सकता। हटाने की बात तो बहुत दूर की रही। हमारे घर में भी एक बड़ा सा पुराना बक्सा रखा है। कई बार हटाने को बोला है, पर नहीं, वो तो वही कमरे के बीचो बीच रहेगा। आखिर वो बक्सा हमारी माँ का जो है।

आगे जाने से पहले समझते हैं आखिर ये बक्सा हर घर में पाया क्यूँ जाता है, और क्या ही इसकी आवश्यकता है। पहले ज़माने में कुछ ज्यादा अलमारी नहीं होती थीं। दिवारों में ही चार खाने बने होते थे, जिसमें सीलन सामान खराब कर देती थी। या फिर चुहे नुक़सान कर देते थे। इससे बचने के लिए लकड़ी की अलमारी बनाई गयी, पर उसमे भी दीमक, चूहे, सीलन आदि सामान खराब कर देते थे। लोहे की अलमारी काफी महँगी होती थी, हर कोई उसे खरीद नहीं पाता था। और काफी भारी भी होती थी। इसलिए टीन के बक्सों का चलन हुआ। ये हल्के और सस्ते होने के साथ साथ काफी मजबूत भी थे। इसलिए शादी समय औरतों को एक बक्सा दिया जाता था, ताकि वे अपना सामान इसमे रख लें। अब क्यूँकि ये बक्सा उनके घर से आया था, तभी शायद उनको सबसे प्रिय था। आज कितनी ही नयी अलमारी या वार्डरोब बनी हुई हों, पर वो बक्सा नहीं हटेगा।

हमारे भी घर हमारी माँ का बक्सा है। अब कैसे आया होगा ये तो नहीं याद। हम काफी छोटे रहे होंगे तब। पर इस बक्से पर चढ़ना, कूदना इस पर, छलांग लगाना आदि सब बचपन की बात याद है। कूदने से उसके ऊपर का ढक्कन थोड़ा पिचक गया और गड्ढा भी पड़ गया। इसमे तब हम गरम कपड़े रखते थे। तब चूहों की थोड़ी समस्या थी, इसलिए ये बक्सा काफी काम का था। लेकिन एक शिकायत भी थी। पुराने बक्से में आपने देखा हो तो काफी नुकीले कोने होते थे। जरा सा टकरा जाओ, तो कपड़े फट जाते, या फिर कभी कोनी भी छिल जाती। बस यही एक बात बक्से की हमें काफी खराब लगती थी।

जैसे जैसे हम बड़े हुए, घर में काफी नयी अलमारी आ गयीं और फिर वार्डरोब भी बन गयीं। अब बक्से की जरूरत कम होने लगी। हमने सोचा बक्सा काफी बड़ा है, क्यूँ ना इसे छोटा करवाया जाए। हमारी माँ एक बक्से वाले से बात कर के आयी और हम बक्सा खाली कर ले गए उस बक्से वाले के पास। हमने सोचा इस बक्से के दो छोटे बक्से हो जाएंगे तो काफी सहूलियत हो जाएगी। पर उधर कुछ गडबड़ी होने के कारण हमें बक्सा वापस लाना पड़ा। ऐसा लग रहा था कि मानो बक्से का आज टहल के आने का मन हुआ हो। उसमें वापस से सामान लगाकर हमने उसे वहीं उसी जगह रख दिया।

जैसे जैसे हम और बड़े हुए, हमारी माँ से बहस और बड़ने लगी। आखिर है क्या इस बक्से में। जबरदस्ती की जगह घेर रखी है। कमरे के बीच रख रखा है। आने वाले मेहमान क्या सोचेंगे। या तो इसमें अब कुछ काम का हो। पर नहीं हम इसे हटाएंगे नहीं, चाहे कुछ भी हो। मैं बहुत परेशान हो गया। फिर सोचा छोड़ो रहने दो। तबही मेरे एक दोस्त का नया मकान बना था। उसने मुझे मुहूर्त में बुलाया था। घर काफी बड़ा और सुन्दर बनाया था। बिल्कुल फ़िल्मों जैसा। जैसे फ़िल्मों में घर के बीच से सीढ़ी जाती ठीक वैसा ही आलीशान सा घर था। घर घूमते घूमते जब में ऊपर जाने लगा तो सीढ़ियों के पास दो बड़े बक्से रखे थे। वो कुछ ज्यादा ही बड़े थे। मैंने अपने दोस्त की तरफ देखा, वो समझ गया। उसने कहा चाहे हम कितने भी अमीर हो जायें, पर ये बक्से नहीं जाने वाले। मुझे जोर की हसी छूट गयी। शायद हमारे अकेले की समस्या नहीं थी ये बक्से, सबके ही घर में ये बक्से भगवान के भाती विराजमान हैं।

उस दिन के बाद से मैंने फिर माँ को बक्से के बारे में टोकना बंद कर दिया। हाँ कभी कभी उनको चिढ़ाने में मजा आता है। जैसे कि ये बक्सा हटा दो मम्मी, क्यूँ ही रख रखा इसे। इस पर उनको गुस्सा और चिढ़ता देख काफी मज़ा आता है। उस बक्से की एक कुंडी टूट गयी थी, मैंने उसे रिपट लगा के जोड़ दी। मम्मी काफी खुश हो गयी। फिर सोचा ये बक्सा तो कहीं जाने से रहा, क्यूँ ना इस पर पैंट कर के इसे थोड़ा सजा दिया जाए। फिर क्या था, बक्से को फटा फट खाली करा और उसकी मरम्मत करनी शुरू कर दी। वो गड्ढे जो हमने बचपन में कूद कूद कर बनाए थे, अब उनको ठीक करने का समय आ गया। कुछ गलतियाँ सुधारने का प्रयास किया जा रहा है।

धन्यावाद,
Ayush P Gupta
04 Oct 2026

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Last Updated: 10/4/26, 7:37 AM
Contributors: Ayush P Gupta
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