बहती नदी

रविवार का दिन है। हल्का मानसून है। हवा ठंडी है। सूर्योदय का समय है, पर शायद बादल उसे उगने नहीं दे रहे। मानो सूर्य को अवकाश लेने को कह रहे हों। मैं लखनऊ में गोमती नदी के किनारे खड़ा हूँ। कुछ लोग और भी हैं, जो शायद इन्हीं सब में खोए हुए हैं, मानो उनका मन भी शांत होना चाह रहा, भले ही कुछ पल को सही। चिड़ियां चह चहा रहीं हैं, इधर उधर उड़ रहीं हैं निडर होकर, मानो एक बच्चा मिट्टी में खेल रहा हो।
कुछ देर नदी को देखते हुए, मैंने सोचा नदी बस बहती चली जा रही है, क्या इसे आगे का कुछ पता भी है? आगे क्या होगा? शायद वो जानती है, शायद नहीं भी। सोचा कुछ लिखूँ इसपर। तभी समझ आया नदी और मनुष्य की जिंदगी काफी मिलती जुलती है। मगर कैसे? शायद मैं इसे कुछ हद तक आपको समझा पाऊँ।
जिस तरह से मनुष्य जन्म लेता है, एक दम छोटा सा, कोमल, नाजुक, मासूम, कली सा, ठीक उसी तरह से नदी का जन्म होता है। कुछ पानी की बूँदें, कुछ हवा, कुछ धरती के कण मिलकर एक जल का स्त्रोत बनते हैं। जैसे जैसे बच्चा बड़ा होने लगता, उसे बाहरी समझ आनी शुरू होती, उसी प्रकार से एक छोटा सा पानी का स्त्रोत, बाहरी दुनिया से मिलकर अब नदी बनने लगता है। जिस तरह से बच्चा लडखडाता है, नदी भी उसी तरह सीधी नहीं बह पाती।
अब संघर्ष शुरू हो जाता है, कई ठोकरें लगती हैं, पर बच्चे की आगे बढ़ने की उत्सुकता उसे ये एहसास नहीं होने देती। ठीक वैसे ही आपने देखा होगा नदी शुरू में कितने विशाल वेग से चलती, मानो जैसे उसे दौड़ने से कोई नहीं रोक सकता। चाहे पत्थर आए या झरना, वो सब चीरती हुई भागी जाती है। सच में बच्चों को भी रोका नहीं जा सकता। उनकी जिज्ञासा जितना रोकेंगे उतना उनकी उत्सुकता बढ़ेगी।
जैसे जैसे बच्चा बड़े होके इंसान बनता है, वो शान्त होने लगता है। आपने गंगा नदी को देखा होगा, ऋषिकेश से हरिद्वार तक, उसका वेग कम होने लगता है। इसी बीच इंसान की जिंदगी में कई लोग आते हैं जो उसमे सदेव के लिए घुल मिल जाते, जिस तरह से नदी में कई पानी की धारा समय समय पर आकर उसमे घुल जाती हैं और उसे और विशाल रूप में बदल देती हैं।
कुछ नदियों के पानी में लोग स्नान करते, कुछ अपने खेत जोतते, कुछ अपनी प्यास बुझाते। ठीक इसी तरह से मनुष्य अपने जीवन से कई लोगों का उद्धार अनजाने में कर डालता है। पर क्या इससे नदी छोटी हो जाती? नहीं। पर शायद कुछ मनुष्य छोटे हो जाते।
जैसे जैसे नदी और आगे बहती, वो और शान्त होती जाती। जो नदी पहले पत्थरों को चीर देती अब शायद उन्हें खुद में समा लेती। शायद उसे जो तलाश थी, वो अब नामुमकिन सी दिखाई देती। वो रोती भी होगी, पर हमे दिखाई नहीं देता होगा। कुछ ऐसा ही अभिव्यक्ति नदी की मेरे सामने थी, लखनऊ तक आते आते गोमती शान्त सी हो जाती है।
कभी कभी दुःखों का भार शायद जादा हो जाता होगा। गुस्सा भी आता होगा। हताशा भी होती होगी। तभी बारिश में वह रौद्र रूप धारण कर लेती। सब तहस नहस कर डालती। और कभी इतनी शान्त और सूखी सी हो जाती, जैसे नदी खुद ही प्यासी हो। भले ही उसमे अब तेजी ना हो, पर शायद उसे पता हो, बहना ही उसका कर्तव्य है, और कभी ना कभी उसको उसकी मंजिल मिल ही जायेगी। इसलिए शायद वो धीरे ही सही, बहती जा रही है। इन्सान भी एक समय बाद शान्त हो जाता है। उसे भी शायद अपना कर्तव्य नहीं भूलना चाहिए।
अब नदी काफी जादा विशाल हो गयी है। अब उसे निश्चय करना है, यदी अब भी वो पुराना भार साथ लेगी तो उसका आगे बहना नामुमकिन हो जाएगा। शायद इसीलिए अब वो उन्न सभी रेत, मिट्टी, पत्थरों का साथ छोड़ने लगती है, जिनके सहारे शायद वो इतनी दूर आ पायी। वैसे नदी को लगता है, कि वो उनके सहारे यहाँ आयी। बेचारी नदी। उसे क्या पता उसने अंजाने कितनों की नैय्या पार लगाई है।
जिस तरह से नदी के रेत, पत्थर सब वही छूट जाते, ठीक वैसे ही इंसान के कुछ पसंदीदा चीजें, लोग भी छूट जाते हैं। इंसान अगर ग़म करेगा, तो आगे कैसे बढ़ेगा? कुछ पुराने बोझ उतारने जरूरी होते हैं। यही जिंदगी का एक बड़ा सत्य भी है। हालाकि मैं नहीं मानता इंसान अकेला आया तो अकेला ही जाएगा, उसकी कुछ सुखद स्मृतियाँ भी उसके साथ जरूर जाती होगीं।
नदी ने अब बोझ तो उतार दिया, पर अब वो बिखरने लगी, जैसे गंगा कलकत्ता के पास टूटने लगती। कमाल है जितनी दूर से वो मंजिल की तलाश में चली आ रही थी, और जब वो मंजिल के इतने करीब है तभी टूट जाती। उसे लगता वो हार गयी। शायद उसका टूटना जरूरी भी था, बिना टूटे इंसान को परमात्मा नहीं मिलते। उसको अपना सारा मोह छोड़ना पड़ता है। तभी वह सागर रूपी परमात्मा से मिलने को तैय्यार हो सकता है।
और अंत में नदी को चाहे कितने कठिन रास्ते आए हों, कितने ही बार उसे झरना बनना पड़ा हो, कितने ही मोह त्यागने पड़े हों, हर एक नदी सागर में मिल ही जाती है। मनुष्य की आत्मा का भी अंतः परमात्मा से मिलन हो ही जाता है। इसलिए कितनी भी कठिनाई क्यूँ ना आए, जिस तरह से हर प्रलय के बाद नदी फिर से वैसे ही बहने लगती है, जैसे कभी कुछ हुआ ही ना हो, ठीक उसी तरह से मनुष्य को भी अपना कर्तव्य निभाते चले जाना चाहिए।
धन्यवाद
Ayush P Gupta
05 July 2026