उस ताले की चाबी

करीब रात के बारह बजे थे। मैं और मेरा बड़ा भाई गोवा के अनुजा बीच से वापस लौट कर आए थे। जैसे ही दरवाजा खोलने की बारी आयी, पता चला चाबी हमसे खो गयी। ऐसा लगा मानो हमपे बिजली गिर गयी हो। समस्या इतनी बड़ी इसलिए भी बन गयी क्यूँकि आधी रात का समय था। यूँ तो गोवा सुबह के चार बजे तक नहीं सोता। पर वहाँ के स्थानीय लोगों के लिए कैसा गोवा। ऐसे तो कई ताले तोड़े हैं मैंने, पर ताले भी अब पढ़ लिख कर मजबूत होगए हैं। अब असानी से नहीं तोड़े जा सकते।
ताले, चाबी से याद आया कि इंसान ने ताले बनाए ही क्यूँ? शायद अन्दर कुछ ऐसा रखने लगा कि दरवाजे लगाने पड़ गए और फिर उनपर ताला। कई ताले तो उसने अपने मन के दरवाजों में भी लगा दिए। और उन्न तालों की संख्या बड़ती जा रही है। पर कुछ होशियार चोर आज भी ताला तोड़ ही लेते हैं चाहे किसी भी दरवाजे पे लगा हो।
ताले को एक बड़ी जिम्मेदारी दी गयी है। भले ही छोटा हो या बड़ा, उसने अपने मालिक का विश्वाश सदियों से बनाए रखा है। ताले भी इंसानों की तरह लंबे, पतले, मोटे दिखाई देते हैं। पहले इंसान तो पतला था, पर ताले मोटे और भारी भरकम होते थे। अब इंसान मोटा होता जा रहा और ताले और भी पतले। कुछ ताले तो अब दरवाजे में ही सदा के लिए गाड़ दिए गये हैं। शायद इंसान को उसके लटका हुआ देख उसका दुःख समझ लिया। बेचारा कई सालों से लटका हुआ था, कंधे दर्द करते होंगे। पर शायद उसी में उसकी पहचान और शान थी। अब पता ही नहीं लगता दरवाजा खुला है या बंद।
हर ताले की एक चाबी होती है। ताला कितना ही बलशाली क्यूँ ना हो पर अपनी चाबी के आगे पूरा बिखर जाता है। क्या वह इतना कमजोर है? शायद नहीं। कुछ और ही बात होगी, वरना कोई और चाबी उसे क्यूँ ना खोल पायी?
चाबी और ताले की जुगलबंदी भी अजीब है। एक को आजादी मिली हुई है दुनिया घूमने की, और बेचारे एक को सजा दी जाती है लटके रहने की। ताला भी सोचता होगा उसे ये सजा क्यूँ दी? उसका भी घूमने का मन होता होगा। पर शायद उसे अपनी जिम्मेदारी का भली भांति एहसास है। अगर वो सही से पहरा नहीं देगा तो किस काम का? चाबी थोड़ी लापरवाह रहती, कई बार खो भी जाती, पर शायद दोनों एक दूसरे के बिना रह नहीं सकते।
फिर भी मैं ताले को ज्यादा समझदार और वफादार कहूँगा। चाबियां तो कई आयीं और लगी, पर ताला ना खुला। जैसे उसने कसम खा ली हो। वो धैर्य से लटका रहेगा, भले ही जंक खा जाए, पर अपनी चाबी के बिना खुलेगा नहीं। चाबी को उतना लगाव नहीं। उन्हें तो घूमना है। ज्यादातर अपनी सहेलियों के साथ ही रहती। शायद उसे ताले से ज्यादा छल्ले से प्यार है। उससे जुदाई नहीं पसंद उन्हें। कभी कभी चाबी फिर ताले के पास लौटकर ही नहीं आती। और ताला उसकी राह में सदियों तक लटका रहता। दृढ़ता देखिए ताले की, वो कई हथोड़े सह लेगा, पर अपनी वफादारी नहीं छोड़ता, उसे टूटना ही मंजूर है।
अगर ताला बना है, तो उसकी चाबी भी अवश्य बनी होगी। पर कुछ तालों की चाबी असानी से नहीं मिलती है। जैसे मन के ताले। पता नहीं किस धातु के बने होते हैं, और क्यूँ ही लगा दिए जाते। कभी कभी इंसान पूरी उम्र लगा देता है उनकी चाबी ढूँढने में। जिनको चाबी मिल जाती वही असली सिकंदर बने। कुछ को गलत चाबी मिलती जिससे गलत ताले खुल जाते। कुछ अपनी जगह दूसरों की चाबी ढूँढने में लगे रहते, भले ही अपने ताले बंद रह जायें। ऐसे ही नहीं बहुत परोपकारी है इंसान।
इंसान के पास कुछ तालों की चाबी नहीं है। वे ताले समाज ने या पुरानी कुरीतियों ने जकड़ रखें हैं। उनको खोलने से बेहतर उन्हें तोड़ ही देना चाहिए। कुछ ताले तोड़ दिए हैं, कुछ और तोड़ने बाकी हैं। नयी पीढ़ी ऐसे तालें तोड़ने में काफी तेज है। पर कुछ ताले बंद ही ठीक हैं। उनके खोलने का फायदा नहीं। उनके पीछे जो दर्द है, जो जहर है अगर बाहर आया तो सर्वनाश ही करेगा। हर इंसान के पास कुछ ऐसे ही ताले होते हैं जो दूसरे इंसान को खोलने नहीं चाहिए, ना ही तोड़ने चाहिए। जैसे विश्वास का ताला।
मेरे घर में आज भी बहुत से ताले पड़े हैं। कुछ आज भी अपनी खोई हुई चाबी के इंतजार में हैं। ऐसे ही कई चाबी के गुच्छे भी पड़े हैं। उनमे कुछ चाबी तो पीतल धातु की हैं। ज़रा पोलिश कर दो तो सोने सी चमकने लगेंगी। पर बिना अपने ताले के उनका कोई अस्तित्व नहीं। सोचता हूँ उन सबको बेच कर उनका इंतजार खत्म कर दूँ। बहुत तड़प लिए होंगे।
रात का एक बज गया। हम फिर से अनुजा वापस गए, समंदर के किनारे, उस ताले की मोहब्बत ढूँढने। शायद वो समुंदर में बह चुकी थी। निराशा भाव से हम लौटकर वापस आगए। भाग्य से गार्ड ने हमें एक दूसरी नकली चाबी का जुगाड़ करा दिया। जिस ताले की वफादारी और दृढ़ता की तारीफ हम उपर कर रहे थे, वह कट से एक झटके में दूसरी चाबी से खुल गया था। मैं काफी देर तक उस ताले को देखता रहा। मैं समझ नहीं पाया कि ताला बेवफा निकला या अपनी मोहब्बत को सही से पहचान नहीं पाया। ताला भी शायद इंसान बन चुका था।
धन्यवाद,
Ayush P Gupta
12 July 2026