चार साल के मौसम

आज करीब बारह साल होने जा रहे जब मैं पहली बार अपने कॉलेज गया था। मेरा कॉलेज आईआईटी रुड़की था करीब 30 km दूर हरिद्वार से। कुछ लोग रुड़की को पहाड़ों में बसा शहर सोचते हैं, जबकि हरिद्वार के इतना पास होने पर भी यहाँ पहाड़ नहीं दिखाई देते। पर कॅम्पस में पहाड़ों जैसी स्वच्छता, हरियाली, नमी, शान्ति दिखाई देती है, मानो मसूरी के पहाड़ों में ही अपना कॉलेज बसा हो।
कॅम्पस स्वर्ग से कम नहीं था। गर्मी में ठंडी हवा, बारिश में चारो तरफ लहराती हरियाली, मानो कुदरत के छोटे-छोटे बच्चे उछल कूद कर रहे हो। शायद कुछ पेड़ पौधे आपको नाचते दिखाई देंगे। घास मानो शृंगार करके बैठी हो। फूल और भी खिल उठना चाह रहे हो। मेरे कमरे की खिड़की के बाहर का नज़ारा आज भी मुझे कुछ समझाना चाहता था।
सर्दियाँ काफी निष्ठुर थी। पहाड़ों के पास होने से, रुड़की में काफी सर्दी पड़ती है। कुछ लोगों का सर्दी का मौसम प्रिय होता। ठंड के मारे हड्डियां गल जाए, पर इनको बाहर ठंडी हवा का आनंद चाहिए। कुछ लोग भालू के भाती सोते रहते। सर्दियों में नींद काफी आती थी, पर क्लास होने की वजह से सारे मौसम एक समान लगते थे।
रुड़की में कॉलेज के सिवा ज्यादा कुछ नहीं था। यहाँ के स्थानीय लोगों की जिंदगी छात्रों के इर्द गिर्द घूमती रहती थी। ये समय के साक्षी बनकर ना जाने कितनी पीढ़ियों की कहानियों का हिस्सा बन जाते थे। आप भले ही खाली हाथ दाखिला ले लें, इनके पास सब मिलेगा, ग़द्दा, रज़ाई, बाल्टी, जुते, साइकल। यदि थोड़े साल छात्र और रुक जायें तो ये उनकी गृहस्थी यहीं बसा देते।
हमारे कालेज के पास गंगा की नहर निकलती है। नए हो या पुराने छात्र यहाँ अक्सर आते थे। कुछ तसवीरें लेते थे, और कुछ शायद खुद में खोए रहते। घंटों अकेले बैठे रहते थे। उस समय उन्हें देखकर आश्चर्य होता था, कि ऐसा क्या है जो ये बैठे देख रहे। गंगा में कुछ तो है, बच्चे, बुढ़े, जवान सबको कैसे ना कैसे करके खुशी प्रदान करती है। जरा गंगा के किनारे बैठ जायें थोड़ी देर, और अपनी सब चिंताओ को उसमे विसर्जित कर दें। मन काफी शान्त होता है। मैंने भी एक दो तस्वीरें खींच ली थी।
कालिज सारे एक से होते हैं। सब में वही क्लास, वही प्रोफेसर, वही किताबें होती हैं। फर्क़ सिर्फ वहाँ के छात्रों का होता है। वहाँ के छात्र ही वहाँ के वातावरण को बाकी से अलग करते हैं। लोगों को लगता है कॉलेज में पढ़ाई होती है। मुझे लगता है, पढ़ाई के अलावा बाकी सब कुछ होता है। परीक्षा में पास तो सब हो ही जाते हैं। कुछ एक रात पढ़कर भी अव्वल आते, कुछ पूरे महीने पढ़कर भी नहीं। शायद यहीं से हर पढ़ाकू छात्र को अपना पहला धक्का लगता है।
हमारा कॉलेज काफी शांत प्रकृति का था। रैगिंग वर्जित थी। उस समय ये काफी अच्छा नियम लगता था, पर आज शायद इसी वजह से हम गाली देने में झेपते हैं। रैगिंग आपका वो हिस्सा खोलता है, जो शायद इस समाज को आगे झेलने के लिए बहुत जरूरी है। बाहर हर कोई तो सज्जन व्यक्ती नहीं है। कुछ लोग शिष्टाचार की भाषा नहीं समझते हैं।
मेस के खाने के तो क्या कहने। खाना भले ही ताजा हो, कितना ही स्वादिष्ट क्यूँ ना दिखे, खाना एकदम बेस्वाद। इसका रहस्य आज तक नहीं समझ आया। ऐसा नहीं हमारी दाल पानी वाली होती थी, या दही छाछ समान होता था, किन्तु उसमे स्वाद नाम की चीज नहीं होती थी। ऐसे तो मेस खाली रहती थी, यादा कदा कोई मीठी चीज होने पे कुछ रौनक हो जाती थी। यदि मूंग का हलवा हो, तो लाइन बाहर तक लग जाती थी। समझ आजाता था कि आज प्रसाद मिल रहा है।
दोपहर बाद केन्टीन खुल जाती थी। इसे आज की भाषा में कैफे कहेंगे। यहाँ सब मिलता है, पराठे, मैगी, चीज सैंडविच, शेक इत्यादि। यहाँ सब स्वादिष्ट होता है। पैसा हर चीज़ में स्वाद डाल देता है। फलों के साथ साथ पैसा भी पेड़ों पे उगना चाहिए था। फिर शायद गांव की इज्जत बड़ जाती। फिर कोई शहर जाने की जिद ना करता। आधी जनता केन्टीन पे जिन्दा थी। भले ही दोनों आस पास ही थीं, पर केन्टीन को ऊँचा दर्ज मिला हुआ था।
क्लास काफी दूर लगती थी। मैं जिंदगी में जितना पैदल नहीं चला हूँगा, जितना एक महीने में चला था। चल चल के दाँत बाहर आगए थे। रिक्शावाला दस रुपये लेता था। तब यही दस रुपये बहुत लगते थे। वो दिन ही कुछ अलग थे, जब रुपये बचाने के लिए पैदल चलना भारी नहीं लगता था। मगर आपको लगता हो चल चल के कोई पतला हो जाता है, तो बिल्कुल गलत है। पतला इन्सान जरूरत से ज्यादा न खाने से होता है।
काॅलेज में आपको दो प्रकार के छात्र मिलेंगे। एक जिनको बस आज जीना है, कल का कल देखेंगे। और दुर्भाग्य से एक जो कल में जीते हैं। उनको जॉब, सरकारी जॉब की तैय्यारी का सिरदर्द रहता। शायद सही भी हैं वो। इस देश में बिना नौकरी के, पैसे से ज्यादा ये समाज आपको जीने नहीं देगा। दिक्कत और भी तब बड़ती है, जब आप एक होनहार छात्र हों और एक अच्छे कॉलेज से पढ़ रहे हों। आपसे दुनिया को बहुत ज्यादा ही उम्मीद हो जाती है। निठल्ला होता तो उससे वैसे ही किसी को उम्मीद नहीं रहती। कामयाबी हासिल फिर आप अपने लिए नहीं ब्लकि दूसरों को दिखाने के लिए करते हैं। कुछ दोस्तों को मैंने खोया भी है। शायद उनकी चिंता ने उन्हीं को अंदर से खा लिया था। चिंता में लोग अपनी सेहत को एक किनारे कर देते हैं। जैसे बाद में फिर से अच्छी वाली खरीद लेंगे।
कॉलेज में आप हर एक कदम पर एक नयी कहानी बनाते चलते हैं, जो कि ना जाने कितनी और पुरानी कहानियों के साथ मिलके एक अदृश्य विशाल जाला सा बन जाता। हर कदम पर ना जाने कितने जालों से आप टकराते हो, और कुछ आप के उपर लगकर, आपके साथ आगे जिंदगी में चले जाते हैं। क्लास जाते वक्त़ ऐसे ही कुछ जाले जामुन के पेड़ बिखेर देते थे। पूरी सड़क पर जामुन बिखरे हुए रहेते। यकीन मानो आप ये स्वर्ग से कम नहीं दिखता था। रात में चमेली की खुश्बू पूरा रास्ता मेहका देती थी। वो खुश्बू आज भी याद आती है।
चार साल कब निकल जाते हैं आपको पता ही नहीं लगता। कुछ की अच्छी नौकरी लग जाती है, वे शायद आने वाली खुशी से इस ग़म को देख ही नहीं पाते। कुछ आगे की पढ़ाई के लिए चले जाते। और कुछ बेबस शायद अपने घर। ऐसे लोग शायद खुद को अभी और समझना चाहते हैं। आज शायद वो परेशान हो, पर यही परेशानी उनका कल बनाएगा। जितना जल्दी आप खुद को जान लोगे, उतना बेहतर है। बाद में शायद खुद को जानने का अवसर नहीं मिलता।
आज आखरी दिन था कॉलेज का। सारा हॉस्टल खाली हो रहा था। ऐसा लग रहा था बेटियाँ विदाई ले रहीं हों। बस फर्क़ ये था कि इस घर में दोबारा नहीं आ पायेंगे। सदा के लिए पराये हो जायेंगे। यहाँ होगा भी कौन उनका। मेरे भी सब दोस्त जा चुके थे। मैं फिर से गंगा किनारे आके बैठ गया। काफी सवाल थे, काफी तकलीफ भी हो रही थी। शायद आज समझ आ रहा था लोग कैसे यहाँ घंटों तक बैठे रहते हैं। गंगा आज भी वैसे ही शांत सी बह रही थी, जैसे पहले दिन। कुछ भी नहीं बदला था। बस हम बदल गए थे। गंगा भी उन्हीं दुकानदारों के समान लग रही थी। भले ही इसके पास आपको नोटबुक, पेन, बाल्टी, मग्गा ना मिले, पर इसने भी अनेक छात्रों को वो चीज दी है, जो ना कॉलेज में मिलती, और ना ही कोई बाजार में मिलती है। वो है मन की शान्ति। ये उस केन्टीन, या चाय की टपरी की खुशी से भी बढ़कर होती है। जिसकी कभी कभी हमें सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
धन्यावाद,
Ayush P Gupta
09 July 2026