बड़ा मंगल

हमारे लखनऊ में हर साल, जेठ के महीने में हर मंगलवार को, बड़ा मंगल पर्व मनाया जाता है। यह पर्व, ना जाने क्यू सिर्फ लखनऊ में ही देखा गया है। दिन के समय जिधर देखो उधर भंडारा लगा होता है। और कमाल की बात है, हर कोई, बच्चा हो या बुढ़ा, गरीब हो या अमीर, सब भंडारे की लाइन में खड़े मिलेंगे। ऐसा असीम भक्ति हनुमान जी के प्रति कभी नहीं देखी होगी।
हर तरफ भजन चलते हैं, कहीं हनुमान चालीसा, कहीं लखविंदर जी समझाते हुए मिलेंगे की राम को पाना हो तो हनुमान जी से सिफारिश लगाओ, कहीं भक्ति के नाम पर स्पीकर फाड़े जा रहे, और कहीं कुछ लोग शांति पूर्वक, श्रद्धा भाव से भंडारा करते मिलेंगे। सोचता हूं क्या इनकी शान्त भक्ति से भगवन प्रसन्न होंगे? बिना दूसरों को भजन सुनायें इनके कष्ट मिटेगें? खैर जाने दीजिए, हनुमान जी सर्व ज्ञानी हैं, उन्हें सब पता है।
मुझे भी काफी इंतजार रहता बड़े मंगल का। भंडारे जाकर खाना मैं भी कई बार लाया हूँ। लंबी लाइन, ऊपर से तेज धूप, आखिर जेठ का महीना है, आसमान से अंगारे गिरेंगे ही। मुझे थोड़ी शिकायत है कि बड़ा मंगल हम इतनी गर्मी में ही क्यू मानते हैं?
कई बार मैं भी लाइन में लगा। काफी मज़ा आता। क्यूँ नहीं आयेगा? AC कार से उतरकर ये सब करने का अलग मज़ा है। हम क्या जाने गरीबों का दर्द। शायद जो चीज अमीर के लिए मनोरंजन होती, वो कभी गरीब के लिए मजबूरी। खैर आप भंडारे के भोजन का आनन्द लीजिए।
पूरी सब्जी, कड़ी चावल, छोला चावल, ठंडा शर्बत, बूँदी, हलवा ना जाने क्या क्या मिलता है। कमाल की बात है सब शुद्ध भोजन होता, देसी घी का बना हुआ। ना जाने क्यूँ इन भंडारे की देसी घी की पूरी, और मिठाई वाले की शुद्ध देसी घी की पूरी में वो बात नहीं आती। व्यंग था, शायद समझ गए होंगे आप। लोग कानून से डरे या नहीं, भगवन से तो डरते ही हैं।
शाम को हनुमान जी के मंदिरों के बाहर मेला लगता है। मेले में हर प्रकार की चीजें मिलती मिठाई, फास्ट फूड, टैटू वाले, बंदूक वाले, बर्तन, खिलौने इत्यादि सब मिल जाता। मेला शायद अभी भी वैसा ही है, जैसे आपने प्रेमचंद की ईदगाह में पढ़ा होगा। चीजें वही हैं बस लोग कम हो गये हैं। शायद शॉपिंग माॅल में जादा ख़ुशियां मिलने लगी हैं।
हामिद की तरह हर बच्चे का दिल, बारी बारी, हर चीज पर आता। शायद वो तैयारी करके आते होंगे कि उन्हें क्या लेना है। कोई बैट बॉल ले रहा, कोई गाड़ी ले रहा, कोई अब भी बैठकर सोच रहा क्या लूँ। बच्चों का रौब अपने दोस्तों में शायद इन्हीं चीजों से बनता है। लेकिन ज़माना बदल गया है, शायद चीमटा अब रौब नहीं जमा पाएगा। हामिद जैसे समझदार बच्चे भी कहाँ रहे।
कुछ आगे चलें तो फास्ट फूड वाला बुलाने लगा, चओमीन, बर्गर, स्प्रिंग रोल और ना जाने क्या क्या। वैसे तो मुझे ये सब काफी पसंद है, पर उस दिन मेरा दिल नहीं माना खाने को। शायद मैं बड़ा होगया, या शायद जादा अमीर। आगे चलें तो हमारी अमीरी एक गोल गप्पे वाले पे ढीली पड़ गयी। 5 प्रकार के पानी थे। जो कि खाने में सब एक जैसे थे। हींग वाले पानी में हींग के अलावा सब था। पता नहीं कहाँ से ये 5 पानी का प्रचलन शुरू होगया। पहले तो एक ही ड्रम था। फिर शायद इंसान को लगा, जिंदगी इतनी असान क्यूँ है, थोड़ा काम्प्लेक्स करो। प्रॉब्लम पता नहीं सॉल्व हुई या नहीं पर हाँ दिखने में लग रहा हो गयी।
फिर देखा तो लोग टैटू बनवा रहे थे। आज भी वही पोस्टर जिसमें खतरनाक नमूने छपे हैं। मोर पंखी, महादेव, रिंग टाइप डिजाइन, और भी बोहोत कुछ। फिर मैंने देखा लोग अपना नाम लिखवा रहे थे। जब नाम ही लिखना है तो ये इतने डिजाइन क्यूँ रखते हैं। मुझे शक़ है ये बना भी पाते होंगे या नहीं। उस पीली रोशनी में क्या ही दिखता होगा।
एकाएक मेरी नजर एक खिलौने पर पड़ी जो कि कार थी, वो भी थार का मॉडल। मेरी बहन ने कहा ये ले लो, एक पल मानो मुझे इतनी खुशी हुई कि जितनी असली कार लेके ना हुई होती। फिर याद आया हम बड़े होगए हैं, खिलोनों से कैसे खेल सकते? जिंदगी ने हमारा कम खिलौना थोड़ी बना रखा?
आखिर में जाते वक्त़ मैं एक गुब्बारे बंदूक वाले के रुक गया। बचपन में काफी गुब्बारे फोड़े थे, फिर कुछ हिलती हुई कीलें भी। मैंने सोचा फिर से खेलते हैं आज। मेरी पारी से पहेले एक छोटा बच्चा खेल रहा था, पर शायद बंदूक उसके कद से भी बड़ी थी। उसे चलाना भी नहीं आ रहा था। तब ही मैं उसे समझाने लगा कि निशाना कैसे लगाना होता है। उससे तब भी नहीं लगा, जैसे कभी मुझसे भी नहीं लगता था। बंदूक ही सम्भाल लें बड़ी बात है। वक्त़ और मंजर काफी तेजी से निकल जाते हैं।
कुछ मेलों में शायद आज भी वैसे ही रौनक है, जैसे बचपन में थी। वही हलचल, वही भीड़, वही धक्का मुक्की, वही खिलौने और वही वातावरण। अच्छा हुआ अमीरों ने मेला जाना छोड़ दिया वर्ना इसे भी बदल देते। कुछ चीजें नहीं बदलनी चाहिए। वो वैसे ही अच्छी लगती हैं जैसे हुआ करती थी।
उम्मीद है मेला हमेशा वैसे ही लगता रहेगा और हम अगले जन्म में भी वैसे ही किसी पटरी के किनारे बैठे हुए, खिलौने ढूँढते रहेंगे। वैसे ही झुला झूलते रहेंगे। वैसे ही चाट पकौड़े खाते रहेंगे। और शायद अगली बार एक और बच्चा फिर से बड़ा हो चुका होगा।
Ayush P Gupta
04 July 2026