आओ खुद से मिलें

आज सोचा हजरतगंज घूम के आयें। हल्का बारिश का मौसम था। हवा काफी ठंडी थी। घूमने के लिए एक दम बढ़िया मौसम था। मैं फटा फट तैय्यार होकर मेट्रो पहुंचा। मेट्रो में मेरी नजर एक कोने की सीट पर बैठे लड़के पर पड़ी। उसके कान में हैंडफोन लगे थे, और हाथ में एक किताब थी। कुछ पढ़ रहा था, कभी हस रहा, कभी थोड़ा आत्म चिंतन में खो रहा था। शायद अकेला था। उसके बगल में बैठा व्यक्ती कुछ परेशान सा लग रहा था। शर्ट पैन्ट और ऑफिस बैग देखकर मैं समझ गया उसकी क्या परेशानी होगी। उस व्यक्ती को देखकर मेरे मन में एक सवाल आया।
आख़री बार आप खुद से कब मिले थे? आप कहोगे ये कैसा सवाल हुआ? ज़रा सोचिए फिर से। आखिर खुद से मिलने का मतलब हुआ क्या? क्या रोज सुबह, आईने में खुद को देखना, खुद से मिलना हुआ?
यह विषय काफी गंभीर है। सच बताये तो, कुछ लोग सालों से खुद से नहीं मिले होंगे। उनको शायद इस बात का एहसास ना हो। हमें अक्सर लगता हम खुद को काफी अच्छे से जानते हैं, पर ऐसा शायद हमारा भ्रम होता है। खुद को जानना इतना सरल नहीं होता, और शायद जिसने जान लिया वो अब भीड़ का हिस्सा नहीं रहता।
कभी कभी लगता है, हम अपनी नहीं, ब्लकि दूसरों की बनाई हुई जिंदगी जिया करते हैं। दूसरों की? पहली नजर में बात कुछ अजीब लगे। हम कैसे किसी और की जिंदगी जीते हैं, जब की हमारी जिंदगी तो अपनी है, अपनी खुद की है। आईये इस रहस्य को जानने की कोशिश करते हैं।
हमारे मित्र गुड्डू ने एक बार हमसे सवाल करा की आसमान नीला क्यों होता है? पीला क्यों नहीं? विज्ञान ने इसका जवाब खोज रखा है, परंतु ये सवाल सिर्फ छोटे बच्चे ही क्यूँ पूछते? बड़े लोग क्यूँ नहीं? जवाब शायद जिज्ञासा है, जो की धीरे धीरे उम्र के साथ धुलने लगती है, और इंसान समझदार होने लगता है। कितना समझदार बन पाया, इसे नापना मुश्क़िल है।
बचपन से ही हमें ये समाज नियमों के साँचे में ढालने लगता है। ये नियम सही है भी या नहीं, ये किसी को नहीं पता है। क्यूँकी ऐसे नियम कई सालों से बिना किसी प्रश्न के चले आ रहे तो हम सब ने मान लिया कि ये सही हैं। आखिर जिन्होंने इनका विरोध भी किया होगा, उन्हें आसानी से कैसे जीने देता ये समाज। जैसे जैसे नियम थोपे गए, वैसे वैसे बच्चे की जिज्ञासा खत्म होती गयी। जिज्ञासा खत्म हुई तो प्रश्न करना खत्म हुआ। नियम इतने कड़क थे, कि इनका उलंघन, समाज में हे द्रष्टि से से देखा जाता। बस यही से आप शायद खुद की नहीं ब्लकि दूसरे की जिंदगी जीना शुरू करते हैं।
पहले स्कूल, फिर कॉलेज, फिर नौकरी, फिर शादी बिया, और फिर मस्त बुढ़ापा और टाटा बाय। हाँ जी, यही समाज के नियम के अनुसार सबसे उत्तम जीवन है। इसमे गलत कुछ नहीं है, पर क्या इस नियम को पालन करने वाला व्यक्ती सफल हुआ? शायद समाज की नज़रों में, हाँ। इतनी अच्छी नौकरी, पैसा, घर सब था, तो सफल ही हुआ। सफलता की परिभाषा पता नहीं कब से सब के लिए एक जैसी होने लगी।
समाज के नियमों पर हम सब भागते रहते, मेहनत करते रहते, पर क्यूँ? शायद हमें एहसास दिलाया जाता की यही सही मार्ग है। यही सही नियम है। अगर इस पथ से भटके तो आपका कोई अस्तित्व नही है। हो सकता है सही मार्ग भी हो, पर क्या सबके लिए सही हो? शायद नहीं। हर इंसान का सफलता और उसका खेल अलग है। हम सब दूसरे के नियमों पे अपना खेल खेलने की कोशिश करते हैं। कभी कभी हम अपना ही खेल भूल जाते हैं। शायद दूसरों के खेल में विजय होना हमे ज्यादा सुहाता।
इसी बीच कुछ ऐसे इंसान भी होते जो इन नियमों का पालन नहीं करते। वो शायद समझ जाते की हमें अपना खेल खुद खेलना है। अपने नियम खुद बनाने हैं। कहने में काफी सरल लगता, पर ये आप भी जानते कि समाज के विरुद्ध खेलना कितना असान है। जब खेल अलग है, तो खिलाड़ी भी सिर्फ आप ही होंगे।
कुछ लोग अपना खेल शायद इसलिए नहीं खेल पाते क्यूँकि अपना खेल अकेले खेलना होता है। लोग अकेलेपन से डरते हैं। आखिर क्यूँ? ये समझना कठिन है। किस बात से डर लगता है? शायद आपको समाज के लोग नहीं मिलेंगे उधर? या फिर आप अपने आप को अकेले मिलने में डरते हैं। मुझे लगता है यही कारण है। लोग खुद से मिलने में डरते हैं। भला कोई खुद से मिलने को कैसे डर सकता है?
खुद से मिल पाना असान नहीं। रोज सुबह खुद को आईने में देखने से हम खुद से नहीं मिलते। हम उस व्यक्ती से मिलते हैं जो हम नहीं ब्लकि हम जो दूसरे के लिए हैं वो। इसके लिए एकांत बैठना होता है। शायद पूजा पाठ का सही मतलब खुद को खुद से मिलाना था। आखिर वो ईश्वरः भी हम खुद हैं। अहम ब्रह्म अस्मि। अर्थात मैं ही ईश्वरः हूँ। तभी सलाह दी जाती है रोज आप दस मिनट ही सही, एकांत बैठें। उस एकांत में आप सिर्फ खुद से मिलते हो।
एकांत बैठना असान नहीं। कुछ लोग अकेलेपन से घबराते। उन्हें हर वक्त़ लोगों के साथ रहना है। शायद हम अकेलापन से नहीं ब्लकि अपने भीतर की आवाज से डरते हैं। दूसरों की जिंदगी को जीना कौन सी वीरता है? आप दिखने में कितने ही सफल लगो, कितने ही आत्मविश्वास से भरे प्रतीत हो, पर आपका मन बेचैन रहेगा। बिना खुद को जाने इंसान कैसे खुश हो सकता है ?
सवाल अब ये है, खुद से मिलें कैसे? इसके लिए आप हिमालय जाके तप करने का तो नहीं सोच रहे? रहने दीजिए, इतना भी दुर्लभ नहीं खुद को जानना। हाँ अगर खुद के साथ उस बह्र को जानना हो तो जरूर जाए। खुद से मिलना कठिन नहीं है। कुछ लोग सफर में खुद को मिलते हैं, कुछ बसों की सीट पर। कुछ पार्क में, कुछ वॉक पे, कुछ शायद नदी किनारे। कुछ किताबों में भी खुद को ढूँढ बैठे हैं। तरीके कई हैं, और शायद कुछ अलग भी, पर परिणाम ज्यादा महत्वपूर्ण है, जो कि है खुद को खुद से मिलाना।
हर महान व्यक्ती खुद को जाने बिना नहीं बना। आपको महान बनने के लिए खुद को जानना ही होगा। इंसान काफी ताकतवर बनाया गया है। उसे खुद नहीं पता वो क्या क्या कर सकता है। हर व्यक्ती की जिंदगी में एक बड़े अवरोध या बाधा की रेखा खींची हुई है। कुछ लोग इस रेखा को जल्द पार कर लेते हैं और कुछ इसे लक्ष्मण रेखा समझकर पार नहीं कर पाते।
भले ही आप दूसरों की नजर में कामयाब हो या ना हो, पर अगर आप खुद को अच्छे से जानते हो, तो आप कम से कम अपनी नज़रों में तो कामयाब होगए। जिसका पुरुस्कार जिंदगी आपको कभी ना कभी बहुत खूबसूरत तरीके से देगी।
वापस लौटने का समय हो रहा था, मैं मेट्रो में बैठा सबको देख रहा था, मानो जैसे किताबों की दुकान में खड़ा हूँ। हर चेहरा एक किताब, और हर किताब एक नायाब कहानी। कुछ मुस्कराती हुई कुछ दर्द से भरी। सब एक दौड़ में भागते नजर आरहे थे। ऐसी दौड़ जिसमें किसी को कुछ ज्यादा नहीं पता, बस दौड़े जा रहे। तब मैंने सोचा कि इंसान की इस दुनिया से मिलने की दौड़ में कहीं ऐसा ना हो कि जिंदगी बीत जाए और हम कहीं खुद से मिल ही ना पायें। विचार इतना गहरा होगया की मैं अपने स्टेशन पर उतरना ही भूल गया। और वह लड़का अब भी किताब में डूबा हुआ था, शायद मेरे साथ साथ वो भी खुद को ही पढ़ रहा था।
धन्यावाद,
Ayush P Gupta
10 July 2026